भानुप्रतापपुर: वन मंडल भानुप्रतापपुर के अंतर्गत आने वाले ग्राम बांसला के जंगलों में संरक्षित वन क्षेत्र में एएनआर कार्य के नाम पर एक बड़ा खेल सामने आया है। मीडिया के टीम की ग्राउंड रिपोर्टिंग और लगातार खबर प्रकाशित होने के बाद विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। मामला करोड़ों के वन संरक्षण और फेंसिंग कार्य में बरती गई अनियमितता से जुड़ा है। इस पूरे मामले की लिखित शिकायत मुख्य वन संरक्षक कांकेर से की गई है। अब देखना यह होगा कि क्या विभाग के उच्च अधिकारी अपने ही मातहतों के विरोधाभासी बयानों और भ्रष्टाचार के आरोपों पर कोई निष्पक्ष जांच करते हैं या मामला फाइलों में ही दबकर रह जाएगा।
ग्राम बांसला के जंगलों में कूप कटाई के बाद छोटे पौधों को संरक्षित करने के लिए फेंसिंग का कार्य किया जाना था। आरोप है कि मटेरियल सप्लायर को मार्च महीने में ही पूरी राशि का भुगतान कर दिया गया था, लेकिन मौके पर केवल आधा मटेरियल ही गिराया गया। बाकी बची हुई राशि के गबन की पूरी तैयारी थी, लेकिन मीडिया की सक्रियता ने इस योजना पर पानी फेर दिया। खबर प्रकाशित होते ही आनन-फानन में रातों-रात मटेरियल गिराकर अधूरे फेंसिंग कार्य को दोबारा शुरू कराया गया है। मुख्यालय और डिवीजन कार्यालय की नाक के नीचे जब करोड़ों की हेराफेरी और विरोधाभासी बयानों का खेल चल रहा है, तो सवाल उठना लाजिमी है कि दुर्गुकोंदल, अंतागढ़ और आमाबेड़ा जैसे सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में व्यवस्था का क्या हाल होगा?
अधिकारियों के बयानों में फंसा पेंच: कौन सच, कौन झूठ?
इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाली बात वन विभाग के दो जिम्मेदार अधिकारियों के विरोधाभासी बयान हैं, जो विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
एडीएफओ पूर्व वन मंडल भानुप्रतापपुर ऋषभ जैन का कहना हैं कि फेंसिंग का कार्य पूर्ण हो चुका था, लेकिन लगभग 100 मीटर फेंसिंग चोरी हो गई है। अब सवाल यह उठता है कि यदि इतनी बड़ी मात्रा में सरकारी संपत्ति चोरी हुई, तो क्या विभाग ने संबंधित थाने में इसकी एफआईआर दर्ज कराई?
डिप्टी रेंजर मोनीष मण्डावी का बयान: इसके ठीक उलट, डिप्टी रेंजर का कहना है कि फेंसिंग का कार्य अभी पूर्ण नहीं हुआ था। आधा कार्य बचा था जिसे अब किया जा रहा है। उन्होंने चोरी की किसी भी घटना से साफ इनकार किया है। एक ही विभाग के दो अधिकारी एक ही स्थान और कार्य को लेकर अलग-अलग जानकारी क्यों दे रहे हैं? क्या ‘चोरी’ की कहानी भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए गढ़ी गई थी?
उच्च स्तरीय जांच की मांग
मीडिया की टीम द्वारा मामले को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद अब यह स्पष्ट होता दिख रहा है कि मीडिया के दबाव में विभाग अपनी कमियों को सुधारने में जुटा है। हालांकि, सरकारी धन के दुरुपयोग और भुगतान के बावजूद कार्य अधूरा छोड़ने जैसे गंभीर विषयों पर कार्रवाई की दरकार है।
मुख्यालय के करीब यह हाल, तो अंदरूनी इलाकों में ‘अंधेरगर्दी’
ग्राम बांसला का जंगल डिवीजन कार्यालय के बेहद करीब है, जहाँ मीडिया की पहुँच आसान है। यहाँ अधिकारियों ने भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए ‘चोरी’ की झूठी कहानी तक गढ़ दी। अब स्थानीय जानकारों और जागरूक नागरिकों का मानना है कि यह तो महज “ऊंट के मुँह में जीरा” है। असली खेल तो उन क्षेत्रों में हो रहा है जहाँ न तो नेटवर्क है और न ही मीडिया की नियमित निगरानी। दुर्गुकोंदल और अंतागढ़ इन क्षेत्रों में हर साल लाखों-करोड़ों रुपये वन संरक्षण और वनीकरण के नाम पर जारी होते हैं। विभागीय सूत्रों की मानें तो अंदरूनी इलाकों में आधे से ज्यादा निर्माण और संरक्षण कार्य केवल कागजों पर ही ‘हरे-भरे’ नजर आते हैं। आमाबेड़ा जैसे संवेदनशील और दुर्गम क्षेत्रों में विकास कार्यों का भौतिक सत्यापन न के बराबर होता है, जिसका फायदा भ्रष्ट अधिकारी और ठेकेदार मिलकर उठाते हैं।

भ्रष्टाचार का ‘मॉडल’: भुगतान पहले, काम का अता-पता नहीं
बांसला के मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विभाग में भुगतान करो और भूल जाओ” की संस्कृति पनप चुकी है।
मार्च के क्लोजिंग का फायदा उठाकर सप्लायरों को बिना माल सप्लाई किए करोड़ों का भुगतान कर दिया जाता है।
जब तक कोई जांच दल पहुंचता है, तब तक कागजों में कार्य को ‘पूर्ण’ दिखाकर फाइलें दबा दी जाती हैं। यदि कोई मामला उजागर होता है, तो वरिष्ठ अधिकारी इसे चोरी या प्राकृतिक आपदा बताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।
आदिवासी हितों के साथ बड़ा खिलवाड़
दुर्गुकोंदल, अंतागढ़ और आमाबेड़ा जैसे क्षेत्र जनजातीय बहुल हैं। यहाँ के जंगलों पर ग्रामीणों का भविष्य टिका है। लेकिन विभागीय भ्रष्टाचार के कारण न तो जंगलों का संरक्षण हो पा रहा है और न ही कैम्पा या अन्य योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर पर दिख रहा है। वन सुरक्षा के नाम पर घेरा गया तार और लगाए गए खंभे अक्सर केवल सरकारी दस्तावेजों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
जांच का दायरा बढ़ाने की मांग
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि केवल बांसला की जांच काफी नहीं है। यदि सीसीएफ स्तर पर एक विशेष टीम गठित कभानुप्रतापपुर, दुर्गुकोंदल, अंतागढ़ और आमाबेड़ा के पिछले दो वर्षों के कार्यों का भौतिक सत्यापन किया जाए, तो करोड़ों रुपये का एक बड़ा ‘सिंडिकेट’ सामने आ सकता है। क्या प्रशासन केवल हेडक्वार्टर के पास की गलतियों को सुधारेगा, या उन सुदूर जंगलों की सुध भी ली जाएगी जहाँ भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हो चुकी हैं?