सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ के शिक्षा जगत में आज एक गंभीर और चिंताजनक प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है शब्दों और ज्ञान से ज्यादा अब ‘कोर्स से बाहर की किताबों’ का खेल हावी होता जा रहा है। सरकार के स्पष्ट निर्देश हैं कि एनसीईआरटी की किताबों के अलावा किसी भी अतिरिक्त पुस्तक को शासकीय या निजी स्कूलों में प्राचार्य अपनी मर्जी से लागू नहीं करेंगे। लेकिन यह निर्देश अब महज कागजों तक सीमित रह गए हैं। जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग और कहीं अधिक जटिल है।
हर साल एक तय पैटर्न पर यह पूरा तंत्र काम करता है। पहले स्कूलों में एडमिशन की प्रक्रिया पूरी होती है, उसके बाद बच्चों और अभिभावकों को एक तय दुकान या स्वयं स्कूल के माध्यम से किताबें खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है। इन किताबों में बड़ी संख्या ऐसी पुस्तकों की होती है, जो पाठ्यक्रम से बाहर की होती हैं और यही इस पूरे खेल का केंद्र है। 60-70 पन्नों की किताबें 300-400 रुपये में बेची जाती हैं, जिनकी वास्तविक लागत मुश्किल से 60-70 रुपये होती है। सवाल यह नहीं है कि किताबें महंगी क्यों हैं, बल्कि यह है कि इस महंगाई के पीछे कौन-सा गठजोड़ काम कर रहा है।
यह एक खुला रहस्य है कि प्रकाशक स्कूलों को भारी कमीशन देते हैं। यही वजह है कि स्कूल इन किताबों को अनिवार्य बनाते हैं। शिक्षा विभाग तक इस तरह की शिकायतें नियमित रूप से पहुंचती हैं, और विभाग को इस पूरे खेल की जानकारी भी होती है। फिर भी कार्रवाई का अभाव यह संकेत देता है कि समस्या सिर्फ स्कूल और प्रकाशकों तक सीमित नहीं है। धीरे-धीरे यह संदेह गहराता जा रहा है कि इस ‘कमीशन चक्र’ में शिक्षा विभाग के कर्मचारी, अधिकारी और संभवत: उच्च स्तर तक के लोग भी शामिल हो सकते हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जो आदेश स्कूलों को एडमिशन से पहले भेजे जाने चाहिए, वे अक्सर 2-3 महीने बाद जारी होते हैं—जब तक सारी खरीद-फरोख्त और ‘बंदरबांट’ पूरी हो चुकी होती है। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित मौन स्वीकृति जैसा प्रतीत होता है।
अभिभावकों में इस मुद्दे को लेकर गहरा आक्रोश है, लेकिन वे मजबूर हैं। उनका कहना है कि यदि वे स्कूल की शर्तों का विरोध करते हैं, तो बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ की अप्रत्यक्ष धमकी दी जाती है। शिक्षा, जो अधिकार होनी चाहिए, वह अब एक ‘प्रेशर सिस्टम’ में बदलती जा रही है।
दूसरी ओर, प्राइवेट स्कूलों में फीस नियंत्रण का मुद्दा भी उतना ही जटिल है। किताबों और ड्रेस की अनिवार्य खरीद के जरिए स्कूल अप्रत्यक्ष रूप से अतिरिक्त आर्थिक दबाव बनाते हैं। स्कूल संचालकों का तर्क है कि यह ‘व्यवस्था’ का हिस्सा है। जहां तक 10वीं तक की बात है, राज्य सरकार छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक निगम के माध्यम से किताबें उपलब्ध कराती है, लेकिन 11वीं और 12वीं में निजी प्रकाशकों की भूमिका बढ़ जाती है और यहीं से अनियमितताओं की गुंजाइश भी।
हाल के वर्षों में न्यायालयों ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की है। यहां तक कहा गया कि जैसे होटल या अस्पताल में सेवाओं के अनुसार विकल्प होते हैं, वैसे ही शिक्षा में भी विकल्प उपलब्ध हैं, आप जिस स्तर की सुविधा चाहते हैं, उसके अनुसार भुगतान करें। लेकिन यह तर्क एक बुनियादी सवाल को अनदेखा करता है—क्या शिक्षा भी अब पूरी तरह ‘बाजार’ के हवाले कर दी गई है? क्या गुणवत्ता शिक्षा अब केवल आर्थिक क्षमता का विषय बनती जा रही है?
मंत्रालय और जिम्मेदार अधिकारी हर बार एक ही जवाब देते हैं ‘जानकारी नहीं है’, ‘जांच करवाएंगे’, ‘कार्रवाई करेंगे।’ यह जवाब वर्षों से दोहराया जा रहा है, लेकिन न जांच होती है, न कार्रवाई। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस बात को राज्य का बच्चा-बच्चा जानता है, उसे अधिकारी और मंत्री क्यों नहीं जानते?
यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक संकट भी है। शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों का भविष्य संवारना है, न कि उसे एक व्यापारिक मॉडल में बदल देना। यदि समय रहते इस पर ठोस और पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह ‘किताबों का खेल’ आने वाली पीढिय़ों के विश्वास को भी खोखला कर देगा।
अब समय आ गया है कि सरकार केवल आदेश जारी करने तक सीमित न रहे, बल्कि उनके पालन की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित करे। शिक्षा को बाजार से निकालकर पुन: अधिकार और समान अवसर के दायरे में लाना होगा—वरना यह खामोशी ही सबसे बड़ा अपराध बन जाएगी।