​अंधेर नगरी, चौपट राजा: छत्तीसगढ़ के महाविद्यालयों में ‘अतिथि व्याख्याता’ नीति का मज़ाक, एक ही काम के अलग-अलग दाम!

बिलासपुर/रायपुर। छत्तीसगढ़ के शासकीय महाविद्यालयों में नई शिक्षा नीति (NEP) के लागू होते ही व्यवस्था सुधरने के बजाय और अधिक उलझ गई है। प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में ‘अतिथि व्याख्याताओं’ के मानदेय भुगतान में इतनी भारी विसंगतियां सामने आ रही हैं कि इसने सरकार की नीति और नीयत दोनों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आलम यह है कि एक ही विषय, एक ही सिलेबस और समान क्रेडिट पढ़ाने वाले शिक्षकों को अलग-अलग जिलों और कॉलेजों में अलग-अलग वेतन मिल रहा है।
​पसंदीदा कॉलेजों में ‘पूरा भुगतान’, बाकी जगह ‘कटौती की कैंची’
​खबर है कि जिन महाविद्यालयों में ऊँची पहुँच और रसूख वाले ‘चहेते’ व्याख्याता तैनात हैं, वहाँ बिना किसी अड़चन के ₹50,000 का पूर्ण मानदेय भुगतान किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, जहाँ प्रशासन के साथ थोड़ा भी अनबन या तालमेल की कमी है, वहाँ नियमों की ऐसी व्याख्या की जा रही है कि मानदेय को आधा करने की साजिश रची जा रही है।
​व्याख्या एक, नियम अनेक: भुगतान के तीन चेहरे
​राज्य सरकार की नीति इतनी ‘लचीली’ (Flexible) है कि हर कॉलेज का प्राचार्य और बाबू अपने हिसाब से इसकी व्याख्या कर रहा है:
​क्रेडिट सिस्टम: कई जगह केवल क्रेडिट के आधार पर भुगतान कर मानदेय में भारी कटौती की जा रही है।
​पीरियड सिस्टम: कुछ कॉलेजों में पुराने ढर्रे पर केवल कालखंड के हिसाब से गणना हो रही है।
​घंटों का हिसाब: कुछ जगहों पर घड़ी देखकर घंटों के हिसाब से भुगतान का नया पैमाना तय कर दिया गया है।
​हैरानी की बात यह है कि जब सिलेबस एक है और पढ़ाने का समय भी तय है, तो भुगतान की प्रक्रिया में यह ‘क्षेत्रीय भेदभाव’ क्यों?
​जानबूझकर कटौती और ‘धोखाधड़ी’ के आरोप
​अतिथि व्याख्याताओं का आरोप है कि प्रशासन जानबूझकर जटिल नियम थोप रहा है ताकि बजट बचाया जा सके या शिक्षकों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा सके। क्रेडिट सिस्टम और स्टूडेंट-वाइज़ भुगतान की जो सुगबुगाहट है, वह किसी वित्तीय धोखाधड़ी से कम नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है क्योंकि एक ही राज्य में एक ही पद के लिए अलग-अलग भुगतान नियम ‘समान कार्य-समान वेतन’ के संवैधानिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
​प्रशासनिक विफलता या सोची-समझी रणनीति?
​उच्च शिक्षा विभाग की चुप्पी इस विवाद को और हवा दे रही है। यदि शासन ने तत्काल एक स्पष्ट और एकसमान ‘पेमेंट मॉड्यूल’ जारी नहीं किया, तो प्रदेश भर के अतिथि व्याख्याताओं का आक्रोश सड़कों पर उतर सकता है। शिक्षकों का कहना है कि वे कॉलेज चलाने के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं, न कि किसी ‘प्राइवेट बैंक’ की खतरनाक शर्तों के तले गुलामी करने के लिए।
​अब देखना यह है कि क्या शासन इन विसंगतियों को दूर कर पारदर्शिता ला पाता है, या यह ‘पिक एंड चूज’ (Pick and Choose) की नीति ऐसे ही जारी रहेगी।

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