महाविनाश की कगार पर मिडिल ईस्ट: ईरान के न्यूक्लियर प्लांट पर हमला, खाड़ी देशों पर मंडराया परमाणु रेडिएशन का खतरा

USA Iran War : तेहरान/वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग अब उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां से वापसी का रास्ता सिर्फ तबाही की ओर जाता है। ईरान के बुशेहर परमाणु ऊर्जा संयंत्र (Bushehr Nuclear Power Plant) पर हुए हालिया अमेरिकी और इजराइली हमलों ने पूरी दुनिया की धड़कनें बढ़ा दी हैं। एक महीने के भीतर इस न्यूक्लियर प्लांट पर यह चौथा बड़ा प्रहार है, जिससे अब परमाणु रिसाव (Radioactive Leak) का डर हकीकत में बदलता दिख रहा है।

सीमाएं नहीं पहचानता परमाणु खतरा ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर बुशेहर प्लांट को सीधा नुकसान पहुंचता है, तो इसका रेडियोधर्मी असर सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं रहेगा। समुद्री हवाओं और जलधाराओं के जरिए यह घातक रेडिएशन खाड़ी देशों (GCC) की राजधानियों तक फैल सकता है। यह स्थिति न केवल लाखों लोगों की जान जोखिम में डालेगी, बल्कि फारस की खाड़ी के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर देगी।

IAEA की चुप्पी पर सवाल ईरानी परमाणु ऊर्जा संगठन ने इस मामले में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, IAEA के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने पुष्टि की है कि फिलहाल रेडिएशन का स्तर सामान्य है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी परिस्थिति में न्यूक्लियर साइट्स को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है।

बम से ज्यादा ‘गलत निशाने’ का डर रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस युद्ध में असली खतरा परमाणु बम से ज्यादा एक ‘गलती’ का है। अगर कोई मिसाइल रणनीतिक चूक की वजह से रिएक्टर कोर, कूलिंग सिस्टम या स्पेंट फ्यूल पूल पर गिरती है, तो यह चेरनोबिल जैसी त्रासदी को जन्म दे सकती है। इससे निकलने वाला रेडिएशन सैकड़ों किलोमीटर तक तबाही मचा सकता है।

इजराइल के डिमोना पर भी नजरें जंग का दूसरा पहलू यह भी है कि ईरान लगातार इजराइल के डिमोना न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर को निशाना बना रहा है। मार्च के अंतिम सप्ताह में ईरानी मिसाइलें डिमोना के बेहद करीब गिरी थीं। माना जाता है कि वहां इजराइल के 90 से ज्यादा परमाणु हथियार रखे हैं। अगर वहां कोई बड़ी चूक होती है, तो यह हिरोशिमा-नागासाकी से भी 100 गुना भयानक मंजर पेश कर सकता है।

फिलहाल, यूक्रेन के जेपोरेजिया (ZNPP) की तरह अब मिडिल ईस्ट के परमाणु संयंत्र भी युद्ध के मैदान बन गए हैं, जो वैश्विक शांति और पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं।

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