बैतूल। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले से एक रोंगटे खड़े कर देने वाली चिकित्सा घटना सामने आई है, जहां मामूली सर्दी-खांसी को नजरअंदाज करना एक 14 वर्षीय दिव्यांग किशोरी के लिए जानलेवा साबित हो सकता था। बच्ची की नाक के भीतर दर्जनों जीवित कीड़े (लार्वा) पनप गए थे, जो धीरे-धीरे उसके अंदरूनी ऊतकों को खत्म कर रहे थे। डॉक्टरों की सतर्कता से एक बड़ा हादसा टल गया, वरना यह संक्रमण मस्तिष्क तक पहुंचकर मौत का कारण बन सकता था।
दुर्गंध और सुस्ती ने खोली पोल
परिजनों के अनुसार, दिव्यांग होने के कारण बच्ची अपनी तकलीफ बोलकर नहीं बता पा रही थी। पिछले एक महीने से उसे बुखार और सर्दी की शिकायत थी, जिसे सामान्य मौसमी बीमारी मानकर घर पर ही उपचार किया जा रहा था। जब बच्ची की नाक से असहनीय दुर्गंध आने लगी और वह बेहद सुस्त हो गई, तब परिजन उसे निजी अस्पताल ले गए। वहां एंडोस्कोपी के दौरान स्क्रीन पर नाक के अंदर रेंगते हुए जीवित कीड़े देख डॉक्टर भी सन्न रह गए।
बिना सर्जरी मिला नया जीवनदान
गंभीर स्थिति को देखते हुए बच्ची को तत्काल जिला अस्पताल रेफर किया गया, जहां ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. ऋषि माहोर ने कमान संभाली। डॉक्टर ने बिना किसी चीर-फाड़ या जटिल सर्जरी के, एंडोस्कोपिक पद्धति से इलाज शुरू किया। लगातार 5 से 7 दिनों तक चले इस विशेष उपचार के दौरान हर रोज नाक से 5 से 10 जीवित लार्वा निकाले गए। संक्रमण ने नाक के अंदरूनी हिस्से को काफी नुकसान पहुँचाया था, लेकिन समय रहते इसे काबू कर लिया गया।
क्या है ‘नैजल मायोसिस’ का खतरा?
चिकित्सकों ने बताया कि यह दुर्लभ और खतरनाक स्थिति ‘नैजल मायोसिस’ (Nasal Myiasis) कहलाती है। यह तब होता है जब मक्खियां नाक के भीतर या किसी खुले घाव में अंडे दे देती हैं। इन अंडों से निकले लार्वा मांस खाने लगते हैं। डॉ. माहोर के मुताबिक, अगर इलाज में थोड़ी भी और देरी होती, तो यह संक्रमण आंखों की रोशनी छीन सकता था या दिमाग की नसों तक पहुंचकर घातक साबित होता।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि नाक से लगातार बदबू आए, असामान्य सुस्ती हो या लंबे समय तक जुकाम बना रहे, तो इसे मामूली न समझें। खासकर दिव्यांग बच्चों के मामलों में विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है ताकि समय रहते सही इलाज मिल सके।