लाटा, कैंडी के बाद इमली से अब शरबत, जूस और हेल्थ ड्रिंक्स

वन उत्पाद से वैल्यू चैन आधारित अर्थव्यवस्था की ओर

राजकुमार मल

भाटापारा- तब लाटा। अब कैंडी और टॉफी। बहुत जल्द शरबत, जूस और हेल्थ ड्रिंक्स। तैयारी रेडी-टू- सर्व ड्रिंक्स की भी। वैल्यू एडिशन के माध्यम से इमली अब आय का सशक्त माध्यम बनने जा रही है क्योंकि इसके सह उत्पादन भी अब पसंद किए जाने लगे हैं।

इमली केवल एक फल नहीं बल्कि वन से बाजार तक एक संपूर्ण मूल्य श्रृंखला का उदाहरण है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ की इमली इस मामले में इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि अब यहां की इमली जूस, हेल्थ ड्रिंक्स और रेडी- टू- ड्रिंक्स बनाने वाली यूनिटों में खरीदी जा रहीं हैं। लेकिन बेहतर मांग बस्तर और सरगुजा के वनांचलों में मिलने वाली इमली में देखी जा रही है।


पहली बार यह सामग्री

लाटा, कैंडी और टॉफी पहले से बनाए जाते रहें हैं लेकिन जूस निर्माता ईकाइयां इससे शीतल पेय बनाने की तैयारी में है। विभिन्न अनुसंधान में इसमें ऐसे गुणों का होना पाया गया है जो शीतलता देने में सक्षम हैं। साथ ही पाचन में भी सहायक हैं। इसलिए शीतल पेय उत्पादक कंपनियों में इसकी मांग निकलने लगी है। अब यह वनांचलों में रहने वाले वनवासियों की महत्वपूर्ण आय बढ़ाने वाला बनने जा रहा है।


गूदे से मसाला, बीज से गोंद

पल्प मुख्य आधार है लेकिन सूखे पल्प से अब मसाले व इंस्टेंट फूड बनाए जाने लगे हैं। जिसकी मांग होटल और रेडी फूड इंडस्ट्री में खूब मांग है। अक्सर नजर अंदाज किये जाने वाले इमली बीज की डिमांड टैक्सटाइल्स इंडस्ट्रीज, पेपर इंडस्ट्रीज और प्लाईवुड बनाने वाली यूनिटें कर रहीं हैं क्योंकि इसका उपयोग गम के रूप में किया जा रहा है।


अब फेस पैक भी

गूदे और बीज में अल्फा हाइड्रोक्सी एसिड के खुलासे के बाद गूदा और बीज के पाउडर से फेस पैक, स्किन क्लींजर और एंटी एजिंग प्रोडक्ट भी बनाए जाने की शुरुआत हो चली है। यानी खट्टे स्वाद से मीठे अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार स्तंभ बनने जा रही है छत्तीसगढ़ की इमली। अपने सह उत्पादनों के जरिए।

वन उत्पाद से वैल्यू चेन आधारित अर्थव्यवस्था की ओर

छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में उपलब्ध एक महत्वपूर्ण गैर-काष्ठ वन उत्पाद जिसकी उपयोगिता पारंपरिक खपत से आगे बढ़कर वैल्यू एडिशन आधारित उद्योगों तक पहुंच गई है। जूस, हेल्थ ड्रिंक्स, मसाले, गोंद एवं कॉस्मेटिक उत्पादों में इसके बढ़ते उपयोग से इसकी आर्थिक संभावनाएं कई गुना बढ़ी हैं। यदि इमली के संग्रहण, प्रसंस्करण, गुणवत्ता मानकीकरण और विपणन को संगठित ढंग से विकसित किया जाए, तो यह वनवासियों की आय वृद्धि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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