आज से शक्ति की उपासना का महापर्व चैत्र नवरात्रि प्रारंभ हो गया है। नव संवत्सर के स्वागत के साथ ही आज घर-घर में मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री का आह्वान किया जा रहा है। हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें ‘शैलपुत्री’ कहा जाता है, जो स्थिरता और संकल्प का प्रतीक हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री का पूजन कुंडली में चंद्रमा को मजबूती प्रदान करता है, जिससे मानसिक शांति और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
कैसा है मां का स्वरूप?
मां शैलपुत्री वृषभ (बैल) पर सवार हैं, इसलिए इन्हें ‘वृषारूढ़ा’ भी कहा जाता है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है। मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किए हुए मां का यह सौम्य रूप भक्तों के जीवन से जड़ता को मिटाकर चेतना का संचार करता है।
पूजा की सरल और सटीक विधि
शुद्धिकरण: ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को गंगाजल से पवित्र करें।
कलश स्थापना: शुभ मुहूर्त में मिट्टी के पात्र में जौं बोएं और कलश की स्थापना करें। कलश पर नारियल और चुनरी अर्पित करें।
षोडशोपचार पूजन: मां को अक्षत, सिंदूर, धूप और विशेष रूप से सफेद पुष्प अर्पित करें।
घी का दीपक: अखंड ज्योति या घी का दीपक जलाकर दुर्गा सप्तशती का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है।
विशेष भोग और प्रिय रंग
मां शैलपुत्री को सफेद रंग अत्यधिक प्रिय है, जो पवित्रता का सूचक है। आज के दिन गाय के शुद्ध घी से बनी मिश्री-मावा, खीर या सफेद रसगुल्लों का भोग लगाना चाहिए। मान्यता है कि गाय के घी का भोग लगाने से भक्त को रोगों से मुक्ति मिलती है।
सिद्ध मंत्र और आरती
मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नमः।
प्रार्थना: वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
पूजा के अंत में मां की आरती उतारें और अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा याचना करें। पर्वतराज की पुत्री आपकी भक्ति से प्रसन्न होकर जीवन में स्थिरता और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देंगी।