छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) की टेंडर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि टेंडर की शर्तों की व्याख्या करने का अंतिम अधिकार उसी विभाग या कंपनी के पास होता है, जिसने टेंडर जारी किया है।

यह फैसला चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनाया।
क्या है मामला
दरअसल, South Eastern Coalfields Limited (SECL) ने कोरबा क्षेत्र की बगदेवा भूमिगत खदान के लिए एक ट्रायल टेंडर जारी किया था। यह टेंडर स्वदेशी कंटीन्युअस माइनर मशीन के उपयोग से जुड़ा था।
रायपुर की एक कंपनी ने इसमें भाग लेते हुए सैंडविक मॉडल MC-350 मशीन का प्रस्ताव दिया। कंपनी का दावा था कि यह मशीन पुणे में निर्मित है और इसमें 57% से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, इसलिए इसे “नवनिर्मित” माना जाना चाहिए।
हालांकि, SECL की तकनीकी समिति ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। समिति का कहना था कि यही मशीन मॉडल पहले से एक अन्य खदान में उपयोग हो चुका है, जबकि टेंडर की शर्तों में स्पष्ट था कि मशीन पूरी तरह नई होनी चाहिए और भारत की किसी भी खदान में पहले इस्तेमाल नहीं की गई हो।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि टेंडर जारी करने वाली संस्था परियोजना की आवश्यकताओं को समझने की सबसे बेहतर स्थिति में होती है। इसलिए, जब तक कोई निर्णय पूरी तरह मनमाना या दुर्भावनापूर्ण न हो, तब तक न्यायालय को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
ChatGPT के इस्तेमाल पर भी उठा सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि SECL ने “नवनिर्मित” शब्द की व्याख्या के लिए ChatGPT का सहारा लिया, जो नियमों के विरुद्ध है।
हालांकि, अदालत और स्वतंत्र निगरानी अधिकारियों ने पाया कि विभाग ने अपना निर्णय प्री-बिड स्पष्टीकरण और तकनीकी मानकों के आधार पर लिया था। AI टूल का उपयोग केवल सामान्य समझ के लिए किया गया था, जिससे निर्णय की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।