छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा में ‘अकादमिक सारथियों’ का नया सवेरा

रायपुर: छत्तीसगढ़ के राजकीय महाविद्यालयों में शिक्षा की लौ जलाए रखने वाले अतिथि व्याख्याताओं के लिए राज्य शासन एक संवेदनशील और ऐतिहासिक व्यवस्था की ओर कदम बढ़ा सकता है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ‘सेवा सुरक्षा’ और ‘निश्चित मानदेय’ जैसे स्तंभों पर नीति बने, तो यह प्रदेश की उच्च शिक्षा के लिए ‘मील का पत्थर’ साबित होगी।
​1. सेवा सुरक्षा: अनिश्चितता से आत्मनिर्भरता की ओर
​अतिथि व्याख्याताओं की सबसे बड़ी चिंता ‘अस्थिरता’ रही है। एक अच्छी व्यवस्था वह हो सकती है जिसमें व्याख्याताओं को प्रतिवर्ष कार्यमुक्ति (Break) के डर से मुक्त किया जाए। जब तक नियमित नियुक्तियां न हों, तब तक वर्तमान में कार्यरत योग्य शिक्षकों को निरंतरता देना न केवल उनके मनोबल को बढ़ाएगा, बल्कि विद्यार्थियों को भी पूरे सत्र एक ही शिक्षक का मार्गदर्शन प्राप्त होगा।
​2. ‘समान कार्य-समान मान’ और उचित मानदेय
​शिक्षा के क्षेत्र में योग्यता का सम्मान सर्वोपरि है। यूजीसी (UGC) के मानकों के अनुरूप मानदेय की व्यवस्था और उसमें समय-समय पर अनुभव के आधार पर वृद्धि, अतिथि व्याख्याताओं को आर्थिक संबल प्रदान करेगी। इससे वे अपनी पूरी ऊर्जा शोध और अध्यापन में लगा पाएंगे।
​3. अनुभवों का सम्मान: वेटेज प्रणाली
​भविष्य में होने वाली नियमित भर्तियों में अतिथि व्याख्याताओं द्वारा दिए गए अमूल्य वर्षों को ‘वेटेज’ (अतिरिक्त अंक) के रूप में मान्यता देना एक न्यायपूर्ण कदम होगा। इससे महाविद्यालयों में वर्षों से सेवा दे रहे अनुभवी शिक्षकों के भविष्य के प्रति सकारात्मक माहौल बनेगा।
​4. आकस्मिक अवकाश एवं अन्य सुविधाएं
​अतिथि व्याख्याताओं को भी मानवीय आधार पर सवैतनिक आकस्मिक अवकाश और चिकित्सा अवकाश जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए। एक स्वस्थ और तनावमुक्त शिक्षक ही एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकता है।
​निष्कर्ष: छत्तीसगढ़ के महाविद्यालयों में कार्यरत ये शिक्षक केवल ‘अतिथि’ नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य को गढ़ने वाले ‘अकादमिक सारथी’ हैं। यदि शासन इनके हितों की रक्षा के लिए एक ठोस एवं स्थायी नीति (Policy) बनाता है, तो निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ उच्च शिक्षा के क्षेत्र में देश का एक ‘मॉडल राज्य’ बनकर उभरेगा।
​प्रस्तुति: यह लेख चंद्रशेखर तिवारी जी द्वारा

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