भारत का निर्यात तेजी से बढ़ रहा है और नए व्यापार समझौतों के बाद इसमें और भी उछाल आने की उम्मीद है। लेकिन, तकनीक की दुनिया में भारत के लिए एक बड़ी चुनौती सामने आई है। एआई का वैश्विक बाजार 550 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है और अगले सात वर्षों में यह 3500 अरब डॉलर का विशाल बाजार बन जाएगा। हैरानी की बात यह है कि इस बड़े बाजार में भारत की हिस्सेदारी अभी न के बराबर है।

अमेरिका का है दबदबा
दुनिया भर में एआई सेवाएं देने में अमेरिका सबसे आगे है। ओपन एआई, एंथ्रोपिक्स और एनविडिया जैसी बड़ी कंपनियां अमेरिका की हैं। इन कंपनियों की तकनीक का इस्तेमाल पूरी दुनिया कर रही है और इनके बदले उन्हें मोटा भुगतान किया जा रहा है। भारत के वित्त, स्वास्थ्य, इंश्योरेंस और मीडिया जैसे सेक्टर में भी इन विदेशी सेवाओं का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।
हर महीने करोड़ों का भुगतान
भारत में लाखों लोग हर महीने इन विदेशी कंपनियों को सेवाएं लेने के बदले भुगतान कर रहे हैं। यहां हर महीने एक व्यक्ति 400 रुपये से लेकर 20,000 रुपये तक खर्च कर रहा है। इनमें केवल बड़े संस्थान ही नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग के छात्र भी शामिल हैं, जो पढ़ाई और रिसर्च के लिए हर महीने 20 से 30 डॉलर तक का भुगतान विदेशी कंपनियों को कर रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि हम इन आधुनिक तकनीकों के बहुत बड़े उपभोक्ता बन चुके हैं।
क्या भारत बना पाएगा अपना स्थान?
ग्लोबल सप्लाई चेन में अभी भारत की स्थिति एक खरीदार की तरह है। यदि हमें इस नई तकनीक की दौड़ में शामिल होना है, तो सिर्फ सेवाओं का उपयोग करना पर्याप्त नहीं होगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि हमें अपनी स्वदेशी तकनीक और समाधान विकसित करने की आवश्यकता है, ताकि हम केवल विदेशी सेवाओं पर निर्भर रहने के बजाय इस वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी दर्ज करा सकें।
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