वीणा राज की कविता

 सदियों बाद

जब मुझे ढूंढा जाएगा

तो शायद मैं मिलूंगी

किसी फूल की पंखुड़ियों के बीच

पराग कणों में

या हरी मखमली घास पर बिछे

ओस की छोटी छोटी बूंदों में

या फिर

सागर तट पर बिखरे

सुनहरे चमकती सीपियों में

हवा के साथ उड़ते तिनके में देखना

शायद मेरी एक झलक वहां भी मिले

या फिर हर पढ़ने वाले के मन में

स्नेहिल मुस्कान के साथ

मैं हर उस जगह मिलूंगी

जहां अल्हड़ता और बेफिक्रीहोगी

उदास होते जीवन को

उमंगों से भरा देखना बहुत बड़ीचुनौती है n

इंदिरापुरम, गाजियाबाद

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