
शेफाली शर्मा
मनुष्य ने कई तरह के वर्गीकरण इस पृथ्वीपर विकसित किए और इन्हें बनाए रखने के तमाम उपक्रम समय-समय पर मानवसभ्यता के घिनौने पक्षको उजागर करते रहे हैं। मनुष्यके विकसित वर्गीकरणों से बहुत पुराना वर्गीकरण है जैविक या लैंगिक वर्गीकरण। नर और मादा जीवन के लगभग हर रूप में मौजूद है, जीवछोटा हो या बड़ायह अंतर जीवन की निरंतरता की शर्तके रूप में मौजूद है। अगली पीढी को बनाने वाला रॉ मटेरियल दो अलग शरीरों में तैयार होने से कई जीवविलुप्तहोने से बच गये। कह सकते हैं कियह एक सृजनात्मक वर्गीकरण था, वैसे भी प्रकृतिकेवल सृजन करती है, वह सत्तानहीं बनाती। ‘नर और मादा’ दुनिया का सबसे पुराना और सबसे अंत तक रहने वाला वर्गीकरण है। यह जितना पुराना है उतने ही पुराने उसके सवाल हैं जो हमेशा मनुष्यता के सामने खड़े रहने वाले हैं। ये प्रश्न जटिल हैं क्योंकिये दोनों वर्गएक परिवार का हिस्साहैं और ज्यादातर इन्हें परिवार का अंदरुनी मामला मानकर नजरअंदाज किया जाता रहा है।
सत्ताका अनुभवकरना मनुष्यको हमेशा आनंदित करता है। एक दबा कुचला हारा पुरुषपरिवार के अंदर तो कम से कम सत्ताका अनुभवकरना ही चाहेगा। स्त्रीऔर कभी कभी बच्चेभी जो उस से कमज़ोर है उन्हें दबाकर हमेशा ही पुरुषसत्ताका आनंद लेते रहे है; और आसान कर दिया जाए तो कह सकते हैं किएक ही घर के अंदर एक सवर्णहै तो दूसरा दलित…एक पूँजीपतिहै तो दूसरा शोषित… एक मूलनिवासी है तो दूसरा रिफ्यूजी…हमे ऐसे कई शब्दयहाँ इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन मुझे लगता लगता है इतने से बात बन गई है, तो आगे बढ़ते हैं। मज़ेकी बात यह है किजो दलित पुरूषअपने अधिकारों के लिए लड़ता है वह घर आते ही किसी सवर्णकी तरह बर्तावकरने लगता है। पूँजीपतिके खिलाफ नारा लगाता पुरुषपूँजीपतिके तरह बर्तावकरने लगता है, वह घर की स्त्रीके साथ हो रहे शोषण को नहीं देख पाता। एक रिफ्यूजी जो बहुत अच्छेसे समझता है अपनी जमीन के न होने का दर्दवह भी बिना देर किए अपनी पत्नीको महसूस करा देता है कियह घर तुम्हारा नहीं है। यह संवेदन शून्यता स्त्रीऔर पुरुषके साथ-साथ अगली पीढ़ीतक को नुकसान पहुँचा रही है। स्त्रीचाहे पृथ्वीके किसी भी कोने में हो, किसी भी वर्गया वर्णसे आती हो, किसी भी रंग या धर्मकी हो उसकी मुश्किलें उसकी परेशानियाँ बिल्कुल एक सी हैं। दुनिया की तमाम असमानताओं पर जंग जीत ली जाए तब भी यह एक असमानता हमारे सामने खड़ीरहेगी जिससे लड़ने के लिए हमारा भारतीय समाज अभी बिल्कुल भी तैयार नहीं है। भारतीय संविधान इस जैविक वर्गीकरण को सत्ताका आधार मानने से इंकार करता है, अनुच्छेद 14 ने स्त्रीऔर पुरुषको कानून की नज़र में समान घोषित किया। अनुच्छेद 15 ने लिंग के आधार पर भेदभावको प्रतिबंधित किया। अनुच्छेद 21 ने हर नागरिक को गरिमा के साथ जीवन का अधिकार दिया। काग़ज़ पर यह क्रांतिकारी था, लेकिन जीवन में–यह अब भी एक अधूरा वादे की तरह है। संविधान ने स्त्रीऔर पुरुषको नागरिक बनाया लेकिन समाज ने पुरुषों को संवेदनशील मनुष्यबनाना ज़रूरी नहीं समझा, यहीं से लोकतंत्र दरकता है। स्त्रीके अधिकार कम हैं और कर्तव्यज्यादा।

भारतीय स्त्रीकी स्थितिइसलिए भी अधिक चिंताजनक है क्योंकिउसके ऊपर इस वक्तएक दोहरा बोझ है। उसे एक ओर आधुनिक समाज की आवश्यकताओं की पूर्तिकरनी है तो दूसरी ओर परंपरा का निर्वहन भी करना है। अधिक हास्यास्पद यह है किपरम्परा निर्वहन तो स्त्रीको करना है लेकिन परम्पराओं को बदलना या खत्मकरना पुरुषों के अधिकार क्षेत्र की बात है। समानता, स्वतंत्रता और गरिमा की लड़ाई स्त्रियों ने घर के भीतर बहुत पहले शुरू कर दी थी। कई सामाजिक बदलावजो एक बड़े स्तर पर दिखाई दे रहे हैं उनकी शुरूवात एक स्त्रीने अपने घर से की होती है। जिन स्त्रियों ने इन परम्पराओं को बदला वे पुरूषों की आँख में तिनके की तरह चुभती रहीं; उन्होंने एक ऐसा जीवन जिया जिस की कल्पना भी मुश्किल है। उनके शरीर पर नहीं मन पर जख्महैं। जिस की न शिकायत की जा सकती है, न मुकदमा होगा न दोषी को सजा। ये औरतें चुपचाप सब कुछ सहते हुए बेहतर समाज का निर्माण करती रहीं। वे किसी आंदोलन का हिस्सानहीं रहीं लेकिन आंदोलन उनकी कोख में पलते रहे। इन्होंने दीवार में खिड़की बनाने की वजाय दीवार को तोड़ना ज्यादा ठीक समझा, ताकिअगली पीढ़ीको केवल उसे पार करने की हिम्मत जुटानी पड़े। लम्बेसमय से चल रही समानता की इस लड़ाई ने एक लम्बीदूरी तय की है और कई सकारात्मक बदलावों को सम्भवभी किया है। आज जब समाज में धर्मआधारित राजनीतिका वर्चस्वहै और एक होने की वजाय समाज फिर से टुकड़ों में बंटता हुआ नज़र आ रहा है तब स्त्रीके प्रश्न फिर एक बार सामाजिक और राजनैतिक बहसों से गायब होते नज़र आ रहे हैं, धर्मगुरूओं के टोटकों पर आश्रित होती हमारी स्त्री, अपने अधिकारों की लड़ाई किस तरह लड़ेगी? यह एक बड़ाप्रश्न आज हमारे सामने है। n
छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश