बजट 2026 में माइनिंग कॉरिडोर का ऐलान पहली नजऱ में विकास की तेज़ रफ़्तार का संकेत देता है। रेल, सड़क और बंदरगाहों से सीधे जुड़ाव, लॉजिस्टिक्स की लागत में कमी, उद्योगों की प्रतिस्पर्धा बढऩा—ये सब बातें अर्थशास्त्र की किताबों में सही बैठती हैं। रायपुर-विशाखापट्टनम छह लेन कॉरिडोर से बैलाडीला का आयरन ओर सीधे बंदरगाह तक पहुंचेगा, कोयला और बॉक्साइट की सप्लाई तेज़ होगी और सरकार का तर्क है कि इससे भारत चीन पर निर्भरता घटाएगा। लेकिन सवाल यह नहीं है कि अयस्क कितनी जल्दी बंदरगाह पहुँचेगा।
सवाल यह है कि उस अयस्क की धरती पर रहने वाले लोगों तक क्या पहुँचेगा। छत्तीसगढ़ और ओडिशा दशकों से एक कड़वे मुहावरे के साथ जी रहे हैं अमीर धरती, गरीब लोग। यहां खनिजों से अरबों का कारोबार हुआ, लेकिन आदिवासी इलाकों में स्कूल, अस्पताल, रोजग़ार और सुरक्षित जीवन आज भी संघर्ष की भाषा बोलते हैं। अवैध खनन, नियमों की अनदेखी, पर्यावरण की बर्बादी और विस्थापन की कहानियां नई नहीं हैं। ऐसे में जब सरकार माइनिंग कॉरिडोर को राष्ट्रीय ताक़त और रणनीतिक जरूरत से जोड़ती है, तो भरोसा अपने आप नहीं पैदा होता, उसे अर्जित करना पड़ता है।
रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर चीन की दादागिरी तोडऩे की बात रणनीतिक रूप से सही है। दुनिया की मैन्युफैक्चरिंग, ईवी, सेमीकंडक्टर और रक्षा जरूरतें इन्हीं पर टिकी है लेकिन चीन ने सिर्फ खनन नहीं किया, उसने प्रोसेसिंग, रिसर्च और वैल्यू एडिशन की पूरी चेन अपने हाथ में रखी। भारत अगर सिर्फ खनिज निकालकर बड़े उद्योग समूहों के हवाले करता रहा तो दादागिरी का रंग बदलेगा, चरित्र नहीं। असली मुकाबला तभी होगा जब खनन के साथ स्थानीय प्रोसेसिंग यूनिट, स्किल डेवलपमेंट, रिसर्च सेंटर और ट्राइबल युवाओं के लिए स्थायी रोजग़ार की गारंटी होगी।
केरल, ओडिशा, आंध्र और तमिलनाडु में रेयर अर्थ कॉरिडोर की बात इसीलिए अहम है, क्योंकि यहां पर्यावरणीय संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना दोनों मजबूत है। केरल में कोई भी परियोजना स्थानीय सहमति और पारदर्शिता के बिना आगे नहीं बढ़ सकती। यही मॉडल अगर छत्तीसगढ़ और ओडिशा में लागू नहीं हुआ, तो कॉरिडोर विकास का नहीं, टकराव का रास्ता बन जाएगा। जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई सिर्फ भावनात्मक मुद्दा नहीं है, यह संविधान और संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे का सवाल है।
बजट भाषण में रोजगार और समृद्धि की बात कही गई है, लेकिन रोजगार किसका और समृद्धि किसकी यह साफ़ नहीं है। क्या खनन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी सिर्फ चौकीदार और अस्थायी मज़दूर बनेंगे या हिस्सेदार? क्या डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन जैसी योजनाएं कागज़़ से निकलकर गांवों तक पहुंचेगी?
क्या अवैध खनन पर सख्त कार्रवाई होगी या तेज़ इंफ्रास्ट्रक्चर उसी लूट को और रफ़्तार देगा? माइनिंग कॉरिडोर भारत को ताक़तवर बना सकता है इसमें शक नहीं। लेकिन अगर यह ताक़त कुछ चुनिंदा उद्योग समूहों तक सीमित रही तो विकसित भारत का सपना अधूरा रहेगा। असली सकारात्मक माहौल तब बनेगा जब कॉरिडोर सिर्फ खनिजों को नहीं, भरोसे को भी जोड़े दिल्ली से दंतेवाड़ा तक मंत्रालय से गांव की चौपाल तक। वरना चीन की दादागिरी के खिलाफ लड़ाई में हम भीतर से वही गलती दोहराएंगे जिसकी कीमत सबसे पहले वही लोग चुकाएंगे जो सदियों से इस धरती के सबसे पुराने रखवाले रहे हैं।
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