कॉलेज के ‘ब्रैंडेड’ कुर्सियों पर बैठे ‘Brainded’ प्रिंसिपलों का आतंक, कब जागेगा शासन?

रायपुर। छत्तीसगढ़ की उच्च शिक्षा व्यवस्था आज एक अजीबोगरीब मानसिक बीमारी से जूझ रही है। कॉलेजों के प्राचार्य कक्ष में ऐसे लोग बैठे हैं जो खुद को ‘Branded’ (ऊंचे पद वाला) तो समझते हैं, लेकिन उनकी मानसिकता ‘Brainded’ (संकीर्ण और जकड़ी हुई) हो चुकी है। योग्यता के दम पर सहायक प्राध्यापक बनने के बजाय, ये ‘ब्रांडेड’ साहब लोग उन अतिथि व्याख्याताओं को अपना मानसिक गुलाम समझते हैं, जो वास्तव में अपनी बौद्धिक क्षमता (Brain) से कॉलेज को जिंदा रखे हुए हैं।

  1. ‘ब्रैंडेड’ पद और ‘बेहोश’ (Brainded) जमीर
    शिक्षा जगत में पद का सम्मान उसके ज्ञान से होता है, न कि उसकी कुर्सी की धौंस से। छत्तीसगढ़ के कई महाविद्यालयों में प्राचार्य का व्यवहार किसी तानाशाही से कम नहीं है। अतिथि व्याख्याता, जो PhD और NET/SET जैसी डिग्रियां लेकर कॉलेज आते हैं, उन्हें ये ‘Brainded’ अधिकारी ‘दिहाड़ी मजदूर’ की तरह ट्रीट करते हैं।
    अपमान का व्याकरण: अपनी फाइलों को दबवाना, बेवजह घंटों चैंबर के बाहर खड़ा रखना और बात-बात पर अपनी ‘पावर’ का प्रदर्शन करना—यह इन जकड़े हुए दिमागों की पहचान बन चुकी है।
  2. योग्यता का अपमान: ‘ब्रेन’ बनाम ‘ब्रैंड’
    अतिथि व्याख्याता के पास ‘Brain’ (प्रतिभा) है, जबकि इन प्राचार्यों के पास केवल सरकारी ‘Brand’ (पद) है। विडंबना देखिए कि जिसके पास ज्ञान है, वह अपमान सह रहा है, और जिसके पास केवल पद की मुहर है, वह अहंकार में डूबा है।
    प्रशासनिक बेगारी: ये ‘Brainded’ अधिकारी अतिथि व्याख्याताओं से वे काम करवाते हैं जिनके लिए वे नियुक्त ही नहीं हुए। यदि कोई शिक्षक अपने स्वाभिमान की बात करे, तो उसे “सेवा समाप्ति” की धमकी देना इनका सबसे प्रिय हथियार है।
  3. बजट की ‘फाइल’ और ‘Brainded’ नीतियां
    अधिकारियों का दिमाग इस कदर जकड़ा हुआ है कि उन्हें यह समझ नहीं आता कि शिक्षक को समय पर वेतन न देना अपराध है। बजट होने के बाद भी “तकनीकी दिक्कतों” का बहाना बनाना और भुगतान रोकना, इन अधिकारियों की मानसिक दिवालियापन को दर्शाता है। वे यह भूल जाते हैं कि वे जिस कुर्सी पर बैठे हैं, वह प्रदेश के युवाओं का भविष्य गढ़ने के लिए है, न कि अपनी व्यक्तिगत कुंठाएं निकालने के लिए।
  4. मुख्यमंत्री जी, इन ‘ब्रांडेड’ तानाशाहों पर नकेल कब?
    सरकार को यह समझना होगा कि प्रदेश की उच्च शिक्षा को ‘ब्रैंडेड’ इमारतों और कुर्सियों की नहीं, बल्कि ‘Open Brain’ (खुले दिमाग) वाले नेतृत्व की जरूरत है।
    आवाज़ बुलंद है: अब छत्तीसगढ़ का शिक्षित युवा इन ‘Brainded’ अफसरों की गुलामी स्वीकार नहीं करेगा।
    मांग: ऐसे प्राचार्यों के व्यवहार की गोपनीय जांच हो और जो अतिथि व्याख्याताओं के साथ दुर्व्यवहार करें, उन्हें तत्काल पद से हटाकर फील्ड में भेजा जाए।
    निष्कर्ष: अहंकार टूटेगा, स्वाभिमान जीतेगा
    अतिथि व्याख्याता कॉलेज की ‘ब्रेन’ हैं। अगर ब्रेन काम करना बंद कर दे, तो ‘ब्रैंडेड’ शरीर किसी काम का नहीं रह जाता। सरकार को तय करना है कि उसे प्रदेश में शिक्षा चाहिए या सिर्फ अधिकारियों की तानाशाही।

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