रायपुर, 15 मार्च 2026
लोकतंत्र में सरकारें आवास के लिए धन बांटती हैं, महतारी वंदन से सम्मान देती हैं, मनरेगा में रोजगार की गारंटी देती हैं और पेंशन से बुढ़ापा सुरक्षित करती हैं। लेकिन उसी तंत्र के भीतर एक ऐसा वर्ग भी है, जिसने अपनी जवानी की सुनहरी धूप पुस्तकालयों और कक्षाओं में खपा दी, जो समाज के भविष्य का निर्माण कर रहे हैं, पर जिनका अपना भविष्य ‘कालखंड’ (Period) की अनिश्चितता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। ये हैं उच्च शिक्षा के ‘अतिथि व्याख्याता’—जो डिग्री से ‘डॉक्टर’ हैं, पद से ‘प्राध्यापक’ हैं, पर मानदेय में ‘दिहाड़ी मजदूर’ से भी बदतर स्थिति में हैं।
नीतियों का छलावा: 50 हजार का सपना और कालखंड की हकीकत
सन 2011 से चली आ रही इस व्यवस्था में सरकार ने बजट में 50,000 रुपये मानदेय की घोषणा तो कर दी, लेकिन हकीकत के धरातल पर यह केवल कागजी जादूगरी बनकर रह गई है। आज भी ये उच्च शिक्षित विद्वान ‘कालखंड’ (Lecture-wise) भुगतान के मोहताज हैं। विडंबना देखिए, जिस बौद्धिक स्तर को समाज का मार्गदर्शक होना चाहिए, उन्हें कुछ संस्थानों में घंटों के हिसाब से प्रताड़ित किया जाता है। मानदेय के लिए प्राचार्यों के चक्कर काटना और बजट के अभाव का रोना सुनना, इन विद्वानों के सम्मान पर गहरा प्रहार है।
उम्र की ढलान और अनिश्चितता का डर
इन अतिथि व्याख्याताओं में से कई अब 55 से 62 वर्ष की आयु सीमा में पहुंच चुके हैं। जिन्होंने नेट, सेट और एम.फील./पीएचडी जैसी कठिन परीक्षाओं को पास किया, वे आज नई नियुक्तियों और तबादलों के डर से कांपते हैं। क्या 15-20 साल की सेवा के बाद उन्हें सम्मानजनक ‘विस्थापन नीति’ का अधिकार नहीं? क्या एक पीएचडी होल्डर की नियति केवल ‘रोजगार गारंटी’ के युग में अनिश्चितता के साये में जीना ही है?
परिवार का बोझ और ‘जीने का अधिकार’
संविधान का अनुच्छेद 21 ‘जीने का अधिकार’ देता है, जिसमें सम्मानजनक जीवन और उचित पारिश्रमिक शामिल है। लेकिन यहाँ स्थिति उलट है।
”दो बच्चे, बूढ़े माता-पिता और सिर पर अपनी छत न होना—यह एक उस व्यक्ति की कहानी है जो महाविद्यालय में राष्ट्र के कर्णधारों को नैतिकता और अर्थशास्त्र पढ़ाता है। सरकार महतारी वंदन और मनरेगा में तो संवेदनशीलता दिखाती है, लेकिन उच्च शिक्षा के इन प्रहरी को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है।”
व्यवस्था से चुभते सवाल:
क्या सरकार मानती है कि उच्च शिक्षा के ‘बौद्धिक स्तंभ’ को विश्राम और गरिमापूर्ण जीवन की आवश्यकता नहीं है?
स्थानांतरण और नई नियुक्तियों के नाम पर वर्षों से सेवा दे रहे अनुभवी व्याख्याताओं को सड़क पर लाना कहाँ का न्याय है?
क्या एक 60 वर्षीय विद्वान को अपने हक के मानदेय के लिए भी ‘प्रशासनिक बेशर्मी’ का सामना करना चाहिए?
निष्कर्ष:
यह केवल अतिथि व्याख्याताओं की रोजी-रोटी का सवाल नहीं है, बल्कि यह उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और एक विद्वान के आत्मसम्मान का प्रश्न है। यदि सरकार समय रहते इनके लिए ठोस ‘सेवा सुरक्षा नियम’ और ‘निश्चित मानदेय’ लागू नहीं करती, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए संदेश होगा कि इस देश में ‘कलम’ की साधना करने वालों की कोई जगह नहीं है। सरकार को याद रखना चाहिए कि जिन स्तंभों पर वह अपनी उपलब्धियों की इमारत खड़ी करती है, यदि वे ही ढह गए, तो पूरी व्यवस्था जमींदोज हो जाएगी।
विशेष रिपोर्ट: उच्च शिक्षा के ‘बौद्धिक स्तंभ’ या व्यवस्था के ‘बंधुआ मजदूर’?
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Mar