यातायात का दबाव और नई किस्म के टनल

ऑस्ट्रेलिया से सुभाष मिश्र

यात्रा केवल स्थान बदलने का नाम नहीं है। कभी–कभी वह हमें समय के आर-पार ले जाती है । बीते कल से आने वाले कल की ओर। भारत की धूलभरी ग्रामीण सड़कों से लेकर ऑस्ट्रेलिया की शांत, गहरी सुरंगों तक की मेरी यह यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही , जहाँ रास्ते केवल मंज़िल तक नहीं ले गए, बल्कि भविष्य की झलक भी दिखा गए।

आज भारत हो या ऑस्ट्रेलिया, एक साझा बेचैनी हर शहर में महसूस की जा सकती है । सड़कों पर बढ़ता यातायात, बढ़ती गाड़ियाँ और घटता धैर्य। शहर फैल रहे हैं, जीवन की रफ्तार तेज़ हो रही है, और मनुष्य चाहता है कि वह कम समय में, सुरक्षित और बिना तनाव के अपनी मंज़िल तक पहुँच जाए। शायद इसी चाह ने सड़कों को नए रूप दिए हैं । कहीं चौड़ी एक्सप्रेस–वे, कहीं ओव्हर ब्रिज, और अब ज़मीन के नीचे उतरती हुई टनलें।

भारत में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत जब गाँवों तक पक्की सड़कें पहुँचीं, तो लगा जैसे सदियों का एकांत टूट गया हो। जिन रास्तों पर कभी केवल पैरों की आवाज़ सुनाई देती थी, वहाँ अब वाहनों के इंजनों की गूँज है। इससे जीवन आसान हुआ, पर साथ ही गाँवों से शहरों की ओर बहती भीड़ ने शहरी सड़कों पर बोझ बढ़ा दिया। उसी बोझ को सँभालने के लिए शहरों ने फ्लाईओवर और मेट्रो का सहारा लिया हालाँकि हर जगह यह संभव नहीं था। हर व्यक्ति हवाई जहाज़ से नहीं चल सकता, हर शहर में मेट्रो नहीं पहुँच सकती, और जल–मार्ग भूगोल की सीमाओं में बँधे हैं। अंततः सबसे अधिक दबाव सड़क पर ही पड़ता है। शायद यही कारण है कि अब सड़कें केवल ज़मीन पर नहीं रुक रहीं , वे ऊपर भी जा रही हैं और नीचे भी उतर रही हैं।

भारत में पहाड़ों के बीच बनी टनलें इस बदलाव की सबसे सजीव मिसाल हैं। जब मैं रोहतांग दर्रे के नीचे बनी अटल टनल के बारे में सोचता हूँ, तो वह केवल कंक्रीट और लोहे की संरचना नहीं लगती, बल्कि मौसम से विजित एक ज़िद प्रतीत होती है। जहाँ कभी बर्फ़ के कारण रास्ते महीनों बंद रहते थे, वहाँ अब कुछ ही मिनटों में पहाड़ पार हो जाते हैं। अरुणाचल, उत्तराखंड और जम्मू–कश्मीर की टनलें दूरी ही नहीं घटा रहीं, बल्कि जोखिम, समय और ईंधन , तीनों की बचत कर रही हैं।

दिल्ली–मुंबई एक्सप्रेस–वे या मुंबई–पुणे मार्ग पर चलते हुए यह एहसास और गहरा होता है कि अच्छी सड़क केवल सुविधा नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की धड़कन होती है। टोल टैक्स चुकाना कभी–कभी अखरता है, पर जब गाड़ी बिना रुके, बिना झटकों के आगे बढ़ती है, तो लगता है कि समय और मन दोनों की थकान कम हो गई है।

इन्हीं अनुभवों की पोटली लेकर जब मैं सिडनी पहुँचा, तो वहाँ की नॉर्थकनेक्स टनल ने मुझे चुपचाप चकित कर दिया। लगभग नौ किलोमीटर लंबी यह भूमिगत सड़क, शहर की भीड़–भाड़ और सिग्नलों को मानो एक झटके में पीछे छोड़ देती है। टनल में प्रवेश करते ही ऊपर की दुनिया का शोर कहीं गुम हो जाता है। न लाल–पीली बत्तियाँ, न अचानक ब्रेक , बस एक समान गति और गहरी शांति।

यह केवल सुविधा नहीं थी, यह राहत थी। भारी ट्रक अब रिहायशी सड़कों से दूर थे। शहर ने जैसे चैन की साँस ली हो। यात्रा का समय पंद्रह मिनट तक घट जाना आँकड़ा भर नहीं था , यह जीवन के कुछ अतिरिक्त क्षण थे, जो मनुष्य अपने लिए बचा पा रहा था।

मेलबर्न में बनती और पूरी हो चुकी टनल परियोजनाएँ भी यही संकेत देती हैं कि ऑस्ट्रेलिया ने शहरी यातायात के समाधान के लिए ज़मीन के नीचे की दुनिया को गंभीरता से अपनाया है। वेस्टकनेक्स नेटवर्क हो या मेट्रो टनल परियोजना, ये सब बताते हैं कि भविष्य की सड़कें केवल हमारी आँखों के सामने नहीं होंगी।

ओवर ब्रिज और टनल , दोनों की अपनी ज़रूरत है। जहाँ चौराहों पर टकराव है, वहाँ ऊपर उठना ज़रूरी है। और जहाँ लंबी दूरी और निरंतर यातायात है, वहाँ नीचे उतरना अधिक कारगर। टनलें शहर को ऊपर से नहीं काटतीं, बल्कि नीचे से जोड़ती हैं ,बिना शोर, बिना बड़े पैमाने पर ज़मीन छीने।

यह लेख किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता, बल्कि एक संकेत छोड़ता है। मेरी यह यात्रा भारत की सड़कों से लेकर ऑस्ट्रेलिया की टनलों तक , बस इतना कहती है कि दुनिया अब पुराने रास्तों से आगे बढ़ चुकी है। शायद आने वाले समय में, जब हम किसी शहर में बिना रुके, बिना सिग्नल, शांत और सुरक्षित यात्रा करेंगे तो हमें याद आएगा कि यह बदलाव ज़मीन के नीचे उतरने से शुरू हुआ था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *