ढाबों पर छाया सन्नाटा : कमर्शियल सिलेंडरों की किल्लत से तवा हुआ ठंडा

भोपाल। राजधानी भोपाल और इससे सटे राजमार्गों पर इन दिनों कमर्शियल एलपीजी (LPG) का गहरा संकट खड़ा हो गया है। होशंगाबाद और रायसेन रोड के ढाबों में गैस सिलेंडरों की भारी कमी के कारण रसोई का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है। हालात इतने खराब हैं कि अधिकांश ढाबों ने अपने मेन्यू से तवे पर बनने वाले पकवानों को हटा दिया है, जिससे अब मुसाफिरों को केवल तंदूरी आइटम ही मिल पा रहे हैं।

तवे की जगह तंदूर का राज

गैस सप्लाई चेन में आए अवरोध के कारण ढाबा संचालकों को अपना कामकाज सीमित करना पड़ा है। तवा रोटी, दाल फ्राई और अंडा करी जैसे व्यंजन, जिन्हें गैस की सीधी आंच की जरूरत होती है, अब कई जगहों पर नहीं बन रहे हैं। इसकी जगह लकड़ी और कोयले से जलने वाले तंदूर ने ले ली है। ढाबा मालिकों का कहना है कि वे ग्राहकों को केवल तंदूरी रोटी और कबाब जैसे विकल्प ही दे पा रहे हैं, जिससे व्यवसाय में भारी गिरावट आई है।

महंगाई और कालाबाजारी की मार

गैस की कमी ने कालाबाजारी को भी हवा दी है। जो कमर्शियल सिलेंडर पहले 1800 रुपये में मिलता था, वह अब ब्लैक मार्केट में 4000 से 4500 रुपये तक में बिक रहा है। ढाबा संचालकों के लिए इतनी महंगी गैस लेकर खाना बेचना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। लागत में तीन गुना वृद्धि के कारण कई छोटे ढाबों ने छंटनी शुरू कर दी है, तो कुछ ने अपना कारोबार अस्थायी रूप से बंद कर दिया है।

ड्राइवरों की बढ़ी मुश्किलें

हाइवे पर दिन-रात चलने वाले ट्रक ड्राइवरों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है। ट्रकर्स यूनियन का कहना है कि ढाबों पर भोजन की उपलब्धता कम होने और कीमतें बढ़ने से चालकों की जेब पर बोझ बढ़ रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि गैस की जगह वैकल्पिक ईंधनों का उपयोग करने से खाने की गुणवत्ता और सफाई पर भी असर पड़ रहा है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।

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