बच्चों की परीक्षा के बीच ईद की तैयारियों में भी जुटे हैं लोग
रमेश गुप्ता
भिलाई। पवित्र माहे रमजान की अब विदाई का दौर है। ऐसे में इबादत के साथ-साथ लोग अपने जरूरी काम को भी अंजाम दे रहे हैं और ईदुलफित्र की तैयारियों में भी जुटे हैं। माहे रमजान में मुस्लिम समुदाय की महिलाओं की व्यस्तता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। वहीं नौकरीपेशा और परीक्षा की तैयारियों में जुटे स्टूडेंट भी रोजा रखने के साथ तमाम जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।
खुर्सीपार निवासी उजैर अहमद खान 11 वर्ष के है। रोज़ा रखते हुए अपनी परीक्षा की तैयारी में जुटे है। उजैर कहते हैं रोजे रखने से पढ़ाई पर असर नहीं पड़ता बल्कि और बेहतर ढंग से तैयारी होती है। मोहम्मद एहतेशाम खुर्सीपार निवासी कक्षा 4 में है और उन्होंने इस साल 9 रोज़े रख लिए है हालांकि वर्तमान में परीक्षा चल रही हैं लेकिन रमजान की अजमत ओर रहमतों अल्लाह के अहकाम को पूरा करने उनका जज्बा देखते बनता है।

कुम्हारी निवासी सुभीउन्निसा कहती हैं-रमजान में थोड़ी मसरुफियत जरूर बढ़ जाती है लेकिन तमाम जिम्मेदारियों के बीच इबादत के लिए भी पूरा वक्त मिल जाता पांच वक्त की फर्ज नमाज़ों के साथ-साथ रात में तरावीह (विशेष प्रार्थना) पढ़ना और अल्लाह याद करना सिखाता है हर समय अल्लाह की इबादत, नमाज़, तरावीह और कुरान पढ़ने में गुजरता है, जिससे मन को बहुत सुकून मिलता है।
सेक्टर 7, निवासी शिक्षिका तमन्ना याकूब का कहना है कि रमजान का पाक महीना साल में एक बार आता है हम सब बेसब्री से पवित्र महीने का इंतजार करते हैं। हम सब रमजान में सुबह उठकर सेहरी कर घरेलू कामों में लग जाते हैं और इसके बाद स्कूल जाने की जल्दबाजी रहती है। इन सबके साथ माहे रमजान में तमाम इबादतें पूरी होती है।
हॉस्पिटल सेक्टर निवासी खैरुन्निसा कहती हैं रोजा रखने पर भूखे रहने से गरीबों के दर्द का अहसास होता है। जिससे उदारता और दान (ज़कात) की भावना प्रबल होती है। महीने भर एक जगह पर सभी औरतें इकट्ठा होकर कुरानख्वानी भी करती हैं। शबाना कहती हैं भिलाई रमजान के दिनों में मस्जिदों में रौनक, विशेष नमाजें, और शाम के समय इफ्तार की तैयारी पूरे माहौल को रूहानी और खुशनुमा बना देती है।
सेक्टर 7 निवासी सलमा सिद्दीकी बताती हैं रमजान का मुबारक महीना बुराई और गैर जरूरी कामों को छोड़कर खुद में सुधार करने का बेहतरीन समय होता है। इसलिए हर साल उन्हें रमजान का बेसब्री से इंतजार रहता है। हुडको निवासी अधिवक्ता अकबर कहते हैं कि रमजान में जल्दी उठकर सेहरी खाना और शाम को परिवार या दोस्तों के साथ मिल-बाँटकर खजूर से रोजा खोलना (इफ्तार) एक सामूहिक आनंद का अनुभव होता है। अब रमजान अपने आखिरी अशरे (दस दिन) में है, ऐसे में इस मुबारक महीने के बीतने का अफसोस भी है।
गजाला परवीन कहती हैं इस मुबारक महीना में इबादत के साथ कुरान की तिलावत करके जितना हो सके उसको रोजाना पढ़ें और रोजाना की जिंदगी में उसको लाने की कोशिश करें।