— रवीन्द्र चौबे
भारत रंग महोत्सव की द्वितीय प्रस्तुति के रूप में सोमवार को दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम, रायपुर में मंचित नाटक “शास्ति” ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। रविंद्रनाथ टैगोर की 20वीं सदी के प्रारंभ में लिखी गई प्रसिद्ध कहानी पर आधारित इस नाटक का नाट्य रूपांतरण वीरू मुखोपाध्याय ने किया है, जबकि निर्देशन विधान चंद्र हालदार के सधे हुए हाथों में रहा।
नाटक दंड-विधान, अपराध-बोध, सामाजिक संरचना, स्त्री की अस्मिता, स्वाभिमान और समाज की कथित नैतिकता जैसे जटिल विषयों को केंद्र में रखता है। एक सीमांत किसान परिवार की आंतरिक कलह, उससे उपजा परिस्थितिजन्य अपराध और उसके इर्द-गिर्द बुनी गई न्याय व्यवस्था की मनोवैज्ञानिक परतें दर्शकों को भीतर तक झकझोरती हैं। टैगोर की यह कथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक प्रतीत होती है, जितनी अपने रचनाकाल में थी।

पश्चिम बंगाल के रंगकर्म के लिए प्रसिद्ध गोबरडांग कस्बे की रंग संस्था गोबरडांग रंगभूम द्वारा प्रस्तुत यह नाटक ग्रामीण कलाकारों की सशक्त अभिनय क्षमता का उदाहरण बना। कलाकारों ने कथा को जिस सच्चाई और तीव्रता से मंच पर उतारा, उसने दर्शकों को लंबे समय तक बांधे रखा।
नाटक की प्रस्तुति मूल बांग्ला भाषा में थी, लेकिन प्रभावी देह-भाषा, भाव-प्रस्तुति और मंचीय संकेतों के कारण हिंदी भाषी दर्शकों तक भी कथा का संप्रेषण सहज रूप से हुआ। संवादों की ध्वनि-संयोजना, यथार्थपरक मंच-सज्जा, प्रॉप्स और ग्रामीण परिवेश ने प्रस्तुति को विश्वसनीयता प्रदान की।

विशेष रूप से नाटक की प्रकाश-परिकल्पना दर्शनीय रही, जिसने पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, अपराध-बोध और मानसिक अंधकार को प्रभावी ढंग से उभारा। प्रकाश और अंधकार के इस संतुलित प्रयोग ने नाटक की संवेदनशीलता को और गहरा किया।
प्रस्तुति के दौरान रायपुर के रंगप्रेमियों के साथ-साथ शहर के बंग समाज की उल्लेखनीय उपस्थिति देखने को मिली, जो इस बात का प्रमाण रही कि “शास्ति” भाषाई सीमाओं से परे सांस्कृतिक संवाद स्थापित करने में सफल रहा।
कुल मिलाकर, “शास्ति” का यह मंचन केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि समाज, न्याय और मनुष्य की नैतिकता पर आत्ममंथन का अवसर बनकर उभरा, जो मंच समाप्त होने के बाद भी दर्शकों के मन में गूंजता रहा।