रायपुर में भारत रंग महोत्सव का भव्य आग़ाज़, ‘पारो’ के मंचन ने छोड़ी गहरी छाप

रायपुर। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD), संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार एवं छत्तीसगढ़ शासन के संयुक्त तत्वावधान में भारत रंग महोत्सव का शुभारंभ 3 फरवरी 2026 को रायपुर के दीनदयाल ऑडिटोरियम में गरिमामय वातावरण में हुआ। उद्घाटन समारोह में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक देवेंद्र राज अंकुर, छत्तीसगढ़ संस्कृति परिषद के अध्यक्ष शशांक शर्मा तथा रायपुर के वरिष्ठ रंग निर्देशक राजकमल नायक की विशेष उपस्थिति रही।

उद्घाटन अवसर पर शशांक शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि यह एक सुखद संयोग है कि छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के 25 वर्ष और भारत रंग महोत्सव के 25 वर्ष एक साथ पूरे हो रहे हैं। उन्होंने इसे रायपुर के सांस्कृतिक इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत बताया। वहीं देवेंद्र राज अंकुर ने छत्तीसगढ़ की समृद्ध रंग परंपरा को स्मरण करते हुए इस आयोजन को शानदार और सार्थक बताया। कार्यक्रम को राजकमल नायक ने भी संबोधित किया।
आयोजन के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली की एडवाइजरी कमेटी के सलाहकार सदस्य डॉ. योगेंद्र चौबे ने अपनी बात रखी और उद्घाटन सत्र के लिए आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम की संयोजक गरिमा दिवाकर ने सभी अतिथियों और दर्शकों का स्वागत करते हुए प्रतिदिन अधिकाधिक दर्शकों की सहभागिता का आह्वान किया।

महोत्सव के प्रथम दिन पटना की चर्चित रंग संस्था ‘प्रस्तुति’ द्वारा बाबा नागार्जुन के उपन्यास ‘पारो’ का नाट्य-रूपांतरण दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में मंचित किया गया। यह प्रस्तुति अपने कथ्य, सशक्त निर्देशन और प्रभावी संगीत प्रयोग के कारण दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ने में सफल रही।

बाबा नागार्जुन का ‘पारो’ ग्रामीण समाज में स्त्री-शोषण, सामंती सोच और स्त्री के प्रति क्रूरता को उजागर करने वाली एक सशक्त कृति है। 1946–47 के दौर में रचित यह उपन्यास सामाजिक परिवर्तन और संघर्ष के कालखंड को रेखांकित करता है। नाट्य-प्रस्तुति ने इस कथ्य को बिना किसी अनावश्यक सजावट के, सीधी और तीखी रंगमंचीय भाषा में प्रस्तुत किया। मंच पर पारो का चरित्र केवल एक पीड़ित स्त्री न होकर, पूरे शोषित समाज के प्रतीक के रूप में उभरता है।

नाटक का निर्देशन शारदा सिंह ने अत्यंत संवेदनशीलता और वैचारिक स्पष्टता के साथ किया। उन्होंने करुणा और विद्रोह—दोनों भावों का संतुलन साधते हुए सशक्त मंचीय संरचना रची। दृश्य परिवर्तन सहज रहे और मंचन की गति अंत तक दर्शकों को बाँधे रखती है।

संजय उपाध्याय की संगीत परिकल्पना प्रस्तुति की एक बड़ी उपलब्धि रही। संगीत कथा पर हावी हुए बिना भावनात्मक क्षणों को गहराई प्रदान करता है। लोकधुनों और परिवेशजन्य ध्वनियों का प्रयोग ग्रामीण जीवन के संघर्ष और पीड़ा को प्रभावी ढंग से उभारता है।

अभिनय पक्ष भी उल्लेखनीय रहा। केंद्रीय भूमिका ‘पारो’ को युवा रंगकर्मी रूबी खातून ने अत्यंत संयम और प्रभाव के साथ निभाया, जबकि ‘बिरजू’ की भूमिका में अभिषेक आनंद ने सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। अन्य कलाकारों ने भी अनुशासित और प्रतिबद्ध अभिनय से मंचन को मजबूती प्रदान की।

समग्र रूप से यह प्रस्तुति न केवल एक साहित्यिक कृति का सफल नाट्य-रूपांतरण सिद्ध हुई, बल्कि समकालीन समाज के सामने एक तीखा और प्रासंगिक प्रश्न भी खड़ा करती है। रायपुर के दर्शकों के लिए यह मंचन एक यादगार रंगानुभव बनकर सामने आया। ‘प्रस्तुति’ की यह कोशिश यह प्रमाणित करती है कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ा रंगमंच आज भी उतना ही जीवंत, प्रासंगिक और प्रभावशाली है।

— रविन्द्र चौबे
वरिष्ठ रंगकर्मी

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