
Bargarh। बरगढ़ की POCSO कोर्ट ने 2024 में हुई एक बेहद शर्मनाक और दिल दहला देने वाली घटना में दोषी पाए गए प्रशांत बारिहा को मौत की सजा सुनाई है। मामला पांच साल की नाबालिग बच्ची के यौन उत्पीड़न और हत्या का है। कोर्ट ने कुल 37 सरकारी गवाहों के बयान सुनने के बाद आरोपी को दोषी ठहराया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि मृतक बच्ची के परिवार को ₹15 लाख का मुआवजा दिया जाए, जिसे जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (DLSA) द्वारा सुनिश्चित किया जाएगा।
घटना की पृष्ठभूमि
सरकारी वकील के अनुसार, यह घटना 15 नवंबर 2024 को बरगढ़ जिले के पाइकमल इलाके में हुई। आरोपी ने बच्ची को मछली पकड़ने के बहाने पास के जंगल में ले जाकर उसके साथ यौन उत्पीड़न किया और बाद में उसकी हत्या कर दी। यह घटना इलाके में एक बेहद गंभीर और संवेदनशील मामला बन गई थी।
POCSO कोर्ट ने मामले की सुनवाई यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत की। अदालत ने कहा कि यह अपराध बेहद गंभीर है और इसके लिए कानून के अनुसार अधिकतम सजा आवश्यक है।
न्यायपालिका का रुख
कोर्ट के फैसले ने यह संदेश दिया कि बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन हिंसा और हिंसक अपराधों के मामलों में न्यायपालिका किसी भी प्रकार की सहनशीलता नहीं दिखाएगी। विशेषज्ञों और नागरिकों का कहना है कि यह फैसला बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए कड़ा संदेश है।
सामाजिक और कानूनी महत्व
इस मामले का समाज और मीडिया में व्यापक ध्यान गया। न्यायिक प्रक्रिया और सजा ने यह स्पष्ट किया कि नाबालिगों के खिलाफ अपराधों में दोषियों को कोई रियायत नहीं दी जाएगी। इस निर्णय से यह भी संकेत मिलता है कि भविष्य में ऐसे अपराधों पर कड़े कानून और त्वरित न्याय की प्रक्रिया को और मजबूत किया जाएगा।
पीड़ित परिवार के लिए मुआवजा
कोर्ट ने मृत बच्ची के परिवार को ₹15 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। यह मुआवजा केवल आर्थिक राहत नहीं है, बल्कि इस कदम से यह सुनिश्चित किया गया है कि पीड़ित परिवार को न्याय मिलने के साथ-साथ सामाजिक और कानूनी समर्थन भी प्राप्त हो।
निष्कर्ष
Bargarh POCSO कोर्ट का यह फैसला बच्चों के खिलाफ अपराधों में कानूनी प्रणाली की सख्ती और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। न्यायपालिका ने यह स्पष्ट किया है कि यौन उत्पीड़न और हत्या जैसे जघन्य अपराधों में दोषियों को कानून के अनुसार कठोरतम सजा दी जाएगी। यह फैसला न केवल पीड़ित परिवार के लिए न्याय सुनिश्चित करता है, बल्कि समाज में बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों के प्रति जागरूकता भी बढ़ाता है।