नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की किताबों में न्यायपालिका के खिलाफ विवादित सामग्री को लेकर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इसे न्यायपालिका की गरिमा को कम करने वाला कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह कोई साधारण चूक नहीं बल्कि एक सोचा समझा प्रयास है और जब तक वे इस मामले में पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाते तब तक सुनवाई जारी रहेगी।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को जानकारी दी कि विवादित चैप्टर तैयार करने वाले दो विशेषज्ञों को भविष्य में शिक्षा मंत्रालय या किसी अन्य सरकारी विभाग के साथ काम करने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि बाजार में बिक चुकीं 32 प्रतियों को वापस ले लिया गया है और आगे के प्रकाशन पर रोक लगा दी गई है। हालांकि चीफ जस्टिस ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह सामग्री अभी भी सोशल मीडिया पर उपलब्ध है और उन्हें खुद इसकी एक प्रति मिली है।
कोर्ट ने एनसीईआरटी को फटकार लगाते हुए कहा कि अगर छात्रों और शिक्षकों को यह सिखाया जाएगा कि न्यायपालिका भ्रष्ट है तो समाज में क्या संदेश जाएगा। चीफ जस्टिस ने विवादित अंशों का जिक्र करते हुए कहा कि चैप्टर में न्यायपालिका के खिलाफ मिली शिकायतों और एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश के भाषण के अंशों का गलत संदर्भ में इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने कहा कि किताब में जो कुछ भी लिखा गया वह बेहद लापरवाही भरा है।
सुनवाई के दौरान एनसीईआरटी के निदेशक ने कंटेंट का बचाव करने की कोशिश की जिस पर कोर्ट ने आपत्ति जताई। इसके बाद संस्थान की ओर से बिना शर्त माफी मांगने की पेशकश की गई। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह केवल कक्षा 8 के बच्चों के पाठ्यक्रम का मुद्दा नहीं है बल्कि न्यायपालिका जैसी संस्था की पारदर्शिता और संस्थागत अखंडता की रक्षा का मामला है।