फ्रिबीज को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी

मुफ़्त योजनाओं व सुविधाओं से श्रमिक समस्याएं उत्पन्न हो रही है
खेती , व्यापार ,उद्योग सभी हो रहे प्रभावित


दिलीप गुप्ता
सरायपाली : देश में केंद्र व विभिन्न सरकारों द्वारा अपने राजनैतिक स्वार्थ के चलते देशवासियों को मुफ़्त की योजनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है. उन्होंने इस पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुवे कहा कीस योजनाओं के चलते कई राज्यों की सरकारें भारी कर्ज और घाटे में चल रही है । इससे विकास व निर्माण कार भी प्रभावित हो रहा है किंतु इसके बावजूद मुफ्त योजनाएं बांटी जा रही हैं. सरकारों को इसकी बजाय रोजगार पैदा करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच द्वारा की गई है.
ज्ञातव्य हो कि सीजेआई सूर्यकांत की अगहुवाई वाली बेंच तमिलनाडु की बिजली कंपनी से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही थी. बिजली कंपनी की ओर से यह कहा गया कि हमने टैरिफ की दरें पहले ही तय कर दी थीं. बाद में सरकार की ओर से यह कहा गया कि हमने बिजली फ्री कर दी है. इस पर सीजेआई की बेंच ने सख्त टिप्पणी की.
सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने फ्रीबीज को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर सरकारें मुफ्त पैसे, बिजली या दूसरी सुविधाएं देती रहेंगी, तो आखिर इनका खर्च कौन उठाएगा. उन्होंने कहा कि आखिर फ्रीबीज का बोझ टैक्स देने वाले लोगों पर ही पड़ेगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारों को सिर्फ मुफ्त चीजें बांटने की बजाय रोजगार पैदा करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए.
सीजेआई सूर्यकांत ने देश मे फ्रीबीज सिस्टम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह से फ्रीबीज बांटने पर देश का आर्थिक विकास रुकेगा. कुछ लोग एजुकेशन या बेसिक लाइफ़ अफ़ोर्ड नहीं कर सकते. उन लोगों को सुविधा देना राज्य का फ़र्ज़ है, लेकिन फ्रीबीज पहले उनकी जेब में जा रहे हैं जो लोग मजे कर रहे हैं. क्या यह ऐसी चीज नहीं है, जिस पर सरकारों ध्यान देना चाहिए?
सीजेआई ने कहा कि हमे ऐसे राज्य की जानकारी है, जहां फ्री बिजली है.भले ही आप बड़े लैंडलॉर्ड हों.आप लाइट जलाते हैं. अगर आपको कोई फ़ैसिलिटी चाहिए, तो आपको उसके लिए भुगतान करना होता हैं. यह टैक्स का पैसा है. उन्होंने कहा कि हम सिर्फ़ तमिलनाडु के बारे मे ही बात नहीं कर
रहे हैं. सीजेआई ने कहा कि हम ये पूछना चाहते है कि चुनाव से ठीक पहले इस तरह की मुफ़्त योजनाओं की घोषणा क्यों की जाती हैं.
उन्होंने कहा कि.इस पर सभी राजनीतिक दलों, समाजविज्ञानियों को आइडियोलॉजी पर फिर से सोचने की जरूरत है. यह कब तक चलेगा. सीजेआई ने कहा कि राज्य घाटे में चल रहे हैं, लेकिन फिर भी मुफ्त में दे रहे हैं. उन्होंने कहा कि अगर आप एक साल में 25 परसेंट रेवेन्यू इकट्ठा करते हैं, तो इसका इस्तेमाल राज्य के विकास के लिए क्यों नहीं किया जा सकता?


इस संबंध में नगर के अनेक सामाजिक संगठनों , राजनैतिक दलों , व्यापारी संगठनों के साथ ही प्रबुद्ध वर्गों ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बहुत ही जरूरी व गंभीर है । देश में मुफ़्त की योजनाओं ने देश को गर्त में ढकेल दिया है । कृषि , उद्योग , व्यापार , परिवहन व मजदूर आधारित सभी व्यवसाय इस मुफ़्त योजनाओं से बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं । कार्य करने के लिए मजदूरों के लाले पड़ गये है । श्रमिक समस्याओं से सभी व्यापार प्रभावित हो रहे हैं तो अनेक व्यापारिक व उद्योगों के बंद होने की भी जानकारी मिल रही है । मुफ़्त की योजनाओं व सुविधाओं के चलते कोई काम करना ही नहीं चाहता । जिससे बेवजह श्रमिक दर भी बढ़ जाने से व्यापार में भी काफी नुकसान हो रहा है । मजदूरी दर बढ़ने के कारण मंहगाई भी अनावश्यक रूप से बढ़ रही है । जिसके चलते किसान , उद्योगपति , व्यापारी , वाहन मालिकों आदि को अपने व्यवसाय में काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है । मुफ़्त योजनाओं व सुविधाओं के कारण आज कोई काम भी नहीं करना चाह रहा है सरकार इन्हें रोजगार देने की बजाय कामचोर व कोढ़ीया बना रही है ।
ज्ञातव्य हो कि मुफ्त राशन बांटने पर सुप्रीम कोर्ट की यह तीसरी सख्त टिप्पणी है । इसके पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने 12 फरवरी 2025 को कहा था, ‘लोग काम करना नहीं चाहते, क्योंकि आप उन्हें मुफ्त राशन दे रहे हैं। बिना कुछ किए उन्हें पैसे दे रहे हैं।’ कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि इन लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की बजाय क्या आप मुफ्त की योजनाएं लागू करके परजीवियों की जमात नहीं खड़ी कर रहे हैं?
वहीं दूसरी बार 9 दिसंबर 2024 को भी केंद्र सरकार के मुफ्त राशन बांटने पर सख्त टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था- कब तक ऐसे मुफ्त राशन बांटा जाएगा।
सभी किसानों , व्यापारी , सामाजिक संगठनों , उद्योगपतियों व बुद्धिजीवियों ने सर्वोच्च न्यायालय के इस टिप्पणी का स्वागत करते हुवे तत्काल मुफ़्त योजनाओं व सुविधाओं को समाप्त किए जाने की मांग की है ।

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