धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी का पर्व श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। शास्त्रों में उल्लेख है कि इसी तिथि को भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव का प्राकट्य हुआ था। इस दिन भक्त भगवान काल भैरव की विशेष उपासना करते हैं और अपने जीवन की बाधाओं को दूर करने के लिए व्रत रखते हैं। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से किया गया पूजन और उपवास साधक के जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली लाता है।
कालाष्टमी के पूजन में व्रत कथा के पाठ का विशेष महत्व बताया गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के मध्य अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। इस विवाद के समाधान हेतु भगवान शिव ने एक विशाल सभा का आयोजन किया, जिसमें समस्त देवी-देवता, ऋषि-मुनि और विद्वान उपस्थित हुए। सभा में सर्वसम्मति से एक निर्णय लिया गया, जिसे भगवान विष्णु ने तो सहज स्वीकार कर लिया, किंतु भगवान ब्रह्मा उस निर्णय से सहमत नहीं हुए।
कथा के अनुसार, क्रोधवश ब्रह्मा जी ने भगवान शिव के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। ब्रह्मा जी के इसी व्यवहार और उनके अहंकार को शांत करने के लिए भगवान शिव के अंश के रूप में काल भैरव का प्राकट्य हुआ। इस कारण कालाष्टमी के दिन काल भैरव की पूजा अर्चना करने से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और भक्तों को भय से मुक्ति मिलती है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इस दिन व्रत कथा का श्रवण करना अनिवार्य माना जाता है, क्योंकि इसके बिना पूजा को पूर्ण नहीं माना जाता।
वैशाख कालाष्टमी के इस अवसर पर श्रद्धालु मंदिरों में दर्शन के लिए पहुंचते हैं और दीपदान के साथ काल भैरव देव की कृपा प्राप्त करने हेतु विशेष अनुष्ठान करते हैं। पौराणिक महत्व के साथ-साथ यह दिन अनुशासन और संयम का प्रतीक भी माना जाता है।
