— ध्रुव शुक्ल
इक्कीसवीं सदी में, इतिहास से लगभग अनभिज्ञ हमारा मीडिया और कई राजनीतिक दलों के नेता अब भी —
“मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिशतानी,
सिर पर लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी” —
जैसे गीतों की मानसिकता में अटके हुए दिखाई देते हैं। ऐसे में उन्हें एशिया और यूरोप के संक्षिप्त किंतु यथार्थ इतिहास की याद दिलाना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
सदियों पहले, जब यूरोप के अधिकांश हिस्से वीरानी, अभाव और अंधकार में जीवन व्यतीत कर रहे थे, तब एशिया में समृद्ध और उन्नत सभ्यताओं के प्रमाण मिलते हैं। अनेक धर्मों और दर्शनों की जन्मभूमि भी यही रही है। श्रीकृष्ण, बुद्ध, जरथुस्त्र, पैग़म्बर मुहम्मद, कन्फ्यूशियस और लाओत्से जैसे प्रज्ञावान चिंतक एशिया की ही माटी में जन्मे। उन्होंने प्रेम, करुणा और सह-अस्तित्व से गुंथे बहुरंगी जीवन को साधने के मार्ग बताए।
प्राचीन काल में एशिया अपनी प्राकृतिक संपदा और सामाजिक संरचना के अनुरूप दैहिक जीवन के व्यावहारिक अध्यात्म का महाद्वीप रहा है। इसके विपरीत, यूरोप सोलहवीं सदी के बाद उपनिवेशवादी लूट और तकनीकी प्रभुत्व के बल पर ही शक्तिशाली बन पाया। बीते पाँच सौ वर्षों से यूरोप एशिया के संसाधनों की निरंतर लूट करता आया है। उसकी प्रसिद्धि एक ऐसी भौतिक सभ्यता के रूप में रही है, जो मानव मन को मोहजाल में फँसाती है। यूरोप की व्यापारिक बुद्धि जीवन की एकात्मता से जुड़ने में सदैव पिछड़ी रही है।
बीसवीं सदी के आरंभ में महात्मा गांधी ने संपूर्ण मानवता को आगाह किया था कि यूरोपीय सभ्यता अधर्म पर आधारित है, और पैग़म्बर मुहम्मद साहब की सीख के अनुरूप उसे शैतानी सभ्यता कहा। इसी सदी में अनेक देश औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त होकर लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर बढ़े, किंतु यह सभ्यता उन्हीं लोकतंत्रों में उधार की पूँजी का लोभ, युद्ध का भय और मज़हबी उन्माद फैलाकर एक डरी हुई दुनिया रचती रही। सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फ़ार खान ने गांधी जी से प्रेरणा लेकर एक ऐसी इंसानी बिरादरी का स्वप्न देखा, जिसमें हर व्यक्ति सच्चा ख़ुदाई ख़िदमतगार बने।
विश्व की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को अपने पक्ष में मोड़ने का जो जाल यूरोप ने रचा है, उससे बाहर निकलने का एकमात्र उपाय यही है कि भारत सहित एशिया के इकतालीस देश मिलकर समृद्ध पूरब की परिकल्पना करें। एशिया के देश अपनी प्राकृतिक संपदा की विपुलता और मानव श्रम के वास्तविक मूल्य से परिचित हैं। वहीं यूरोप अपनी चालाक, कृत्रिम और व्यभिचारी व्यापारिक बुद्धि के बल पर इन्हीं संसाधनों और श्रम का दोहन करने को सदैव तत्पर रहता है।
जब यूरोप के देश संगठित होकर अपनी मुद्राओं और मनमानियों का भार एशिया के जीवन और संसाधनों पर डाल रहे हैं, तब एशिया के देशों को भी एक समन्वित राजनीति और अर्थनीति का निर्माण करना चाहिए। एशियाई नेता भली-भाँति जानते हैं कि यूरोप की कुटिल नीतियाँ एशिया के देशों के बीच अनगिनत दूरियाँ पैदा करने में अब तक सफल रही हैं। युद्ध और आतंक के जाल में फँसाकर उन्हें कर्ज़दार बनाया गया है। उनके हथियारों का व्यापार फल-फूल रहा है और एशिया की जनता अभाव, अशांति और असुरक्षा में जीवन जीने को विवश है।
एक समृद्ध एशियाई पूरब ही उस पश्चिम—अर्थात यूरोप—का सामना कर सकता है, जो सदियों से न केवल एशिया के संसाधनों की लूट करता आया है, बल्कि उसकी संस्कृति और सभ्यता के जीवन-मूल्यों को भी विकृत करता रहा है। अनावश्यक आयातित वस्तुओं और विचारों के बीच जीवन में संयम का अभाव बढ़ता जा रहा है। संसाधनों की अंधाधुंध लूट से जीवनदायिनी पृथ्वी स्वयं बार-बार काँप रही है। जीवन की नींव डगमगा रही है।
भारत ने कभी सह-अस्तित्व पर आधारित विश्व-नागरिकता की परिकल्पना की थी और ऐसे निर्भय नेतृत्व की आशा बाँधी थी, जो पृथ्वी के उपकारों के प्रति विनम्र होकर मनुष्य सहित सभी प्राणियों के शुभचिंतक बन सकें। एक ऐसा संसार, जहाँ नस्ल, रंग, जाति, कौम और संप्रदाय का कोई भेद न हो—केवल समूचे जीवन के प्रति संवेदनशील और सहकारी मनुष्यता हो। जहाँ यंत्रों की गुलामी के बजाय मानवीय श्रम से समृद्धि आए और शांति तथा सद्भाव स्थापित हो।
अब वाम और दक्षिण की खाँचों में बँटी राजनीति से काम नहीं चलेगा। हमें एक ऐसा मध्य मार्ग खोजना ही होगा, जो एशिया के अभावग्रस्त जीवन के दुःखों का राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण समाधान प्रस्तुत कर सके।