जबलपुर। प्रख्यात कथाकार, सशक्त गद्यकार और साहित्यिक पत्रिका पहल के संपादक ज्ञानरंजन के निधन पर साहित्य जगत में शोक की लहर है। उनके निधन को हिंदी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति बताया जा रहा है। देशभर के साहित्यकारों, लेखकों और सांस्कृतिक संगठनों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की है। साहित्यकारों का कहना है कि ज्ञानरंजन ने अपनी कहानियों और संपादन कार्य के माध्यम से हिंदी साहित्य को नई दिशा दी। उनकी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, तीखा व्यंग्य और भाषा का सशक्त प्रयोग देखने को मिलता है। पहल पत्रिका के माध्यम से उन्होंने दशकों तक नए और स्थापित रचनाकारों को मंच दिया, जिससे हिंदी साहित्य समृद्ध हुआ। शोक संदेशों में उन्हें साठोत्तरी कहानी आंदोलन का प्रमुख हस्ताक्षर बताते हुए कहा गया कि उनके निधन से प्रगतिशील साहित्यिक चेतना का एक सशक्त स्वर हमेशा के लिए शांत हो गया है। कई साहित्यिक संगठनों ने उनके योगदान को याद करते हुए कहा कि ज्ञानरंजन का रचनात्मक अवदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा। श्रद्धांजलि सभाओं के आयोजन की भी घोषणा की गई है, जहां साहित्यकार उनके जीवन, कृतित्व और योगदान पर चर्चा करेंगे।
अशोक कुमार पांडे ने कहा कि, हिंदी के अप्रतिम कथाकार ज्ञानरंजन जी के निधन की ख़बर आ रही है। क्या कहूँ…एक युग बीत रहा है जिसकी भव्यता और दिव्यता को हमने देखा था। 101, रामनगर, आधारताल, जबलपुर.. यह कई दशकों तक सिर्फ़ एक पत्रिका नहीं अपितु हिन्दी साहित्य समाज की आश्वस्ति का पता था जो हमसे छिन गया।
एक ओर कैलाश बनवासी नामक व्यक्ति ने ज्ञानरंजन के निधन पर शोक जताते हुए कहा कि, हिंदी जगत में समय से आंख से आंख मिलाकर,हर चुनौती का सामना करने वाले दुदुर्ष योद्धा या कहूं सेनापति! इनके जाने से प्रतिबद्धता, जनपक्ष धरता का, वैचारिक ज़िंदादिली का,अथक बहस और विमर्श का जाना है,एक विराट व्यक्तित्व का जाना है। बड़ा शून्य छोड़ जाना है। इस अपराजेय योद्धा को शत शत नमन
कहानीकार और कवि अशोक कश्मीर ने ज्ञानरंजन के निधन पर शोक जताते हुए लिखा कि, हिंदी के अप्रतिम कथाकार ज्ञानरंजन जी के निधन की ख़बर आ रही है। क्या कहूँ…एक युग बीत रहा है जिसकी भव्यता और दिव्यता को हमने देखा था।
विवेचना रंगमंडल जबलपुर
ज्ञानरंजन जी ने अपनी कहानियों और वैचारिकी से देश, दुनिया को दिशा दिखाई। पूरे विश्व में जबलपुर को पहचान और सम्मान दिलाया। विवेचना रंगमंडल को भरपूर स्नेह दिया और “पहल सम्मान” में पुरस्कार पाने वाले साहित्यकार की रचनाओं पर आधारित नाट्य प्रस्तुति करने का गौरवमयी अवसर दिया। विवेचना रंगमंडल परिवार को ज्ञानरंजन जी के जाने से अपूरणीय क्षति हुई है। परिवार ने एक और शुभचिंतक को खो दिया है। विवेचना रंगमंडल ज्ञानरंजन जी को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए, संकल्प को दुहराता है, हमारे वरिष्ठों के बताए सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए उनके बताए मार्ग पर हम निरंतर चलते रहेंगे!!
जनसंदेश टाईम लखनऊ के सुभाष राय के संपादक ने लिखा कि, : उनका होना बना रहेगा उनके न होने पर भी वे दो शताब्दियों के पार भी हमसे मिलते रहेंगे कहते रहेंगे, डरना मत कभी बड़ी से बड़ी सत्ता से भी कहते रहना अपनी बात वे नजर रखेंगे हमारे हर कदम पर चिनगारियां फैंकते रहेंगे हमारे दिमागों पर आवाज लगाते रहेंगे कबीर की तरह, जागते रहो ताकि कोई अजनबी फेंस पारकर तुम्हारे घर में दाखिल न हो सके तुम्हारे आंगन में उगे गुलमोहर की जड़ों पर वार न कर सके वे बार- बार आयेंगे याद जब हम किसी खतरे में होंगे वे यहीं रहेंगे हमसे बतियाते हुए हमारी रचनाओं को नये उच्चारण देते हुए मृत्यु कभी छू भी नहीं पायेगी उन्हें उनके शब्दों की आग को भेद नहीं पायेगी
कवि और लेख विष्णु नागर ने लिखा कि, ‘पहल ‘ के प्रकाशन के दौर में लिखनेवाला शायद ही कोई लेखक होगा,जो ज्ञानरंजन जी से जुड़ा नहीं रहा होगा।कोई ऐसा नहीं होगा , जिसे ज्ञान जी ने अपने हाथ से चिट्ठी नहीं लिखी होगी।कभी औपचारिक,कभी आत्मीय।मैं एक बार उनसे शुक्रवार के लिए लिखवाने में भी कामयाब हुआ।इसे कामयाबी कहना ही ठीक होगा,उनसे कुछ लिखवाना आसान नहीं था।हां वह सबसे लिखवा लेते थे।हमारी पीढ़ी को आगे बढ़ाने में उनका बड़ा योगदान था।
कुछ समय पहले मैंने हरिशंकर परसाई के साक्षात्कारों की पुस्तक का संपादन किया तो उन्होंने अपने लिए हुए साक्षात्कार को उसमें शामिल करने की अनुमति तो दी ही, बाकी साक्षात्कारकर्ताओं या उनके किसी परिवारजनों से संपर्क करवाने में भरपूर मदद भी की।
जब मैं 1971 में दिल्ली आया तो ज्ञानरंजन की कहानियों की धूम थी। मंगलेश डबराल तो उनकी कहानियों का ऐसा दीवाना था कि उनकी कुछ कहानियों के अंश उसे मुंहजबानी याद थे, जैसे वह गद्य न हो, कविता हो।उनसे मुलाकातें याद हैं, दिल्ली में और जबलपुर में।’पहल पुरस्कार’ के समय भी दो बार उपस्थित रहा।
उनके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह खुद पीछे रहते थे जैसे यह उनका आयोजन न हो,जबकि इसके पीछे सारी मेहनत उनकी होती थी।
उन्हें सादर श्रद्धांजलि।
अनिल रंजन भौमिक रंगकर्मि समानांतर इलाहाबाद ने लिखा कि, आप भी चल दिये
जिनके साथ बड़े हुए वे भी चले गए और जिन्हें देखकर बड़े और खड़े हुए कल की रात वे भी चले गए । अब शहर पूरी तरह सूना हो गया । कई दिनों तक भांय – भांय की आवाजें आती रहेंगी। यह एक फोटो पुरानी स्मृति और रिश्ते की जरूरी निशानी है। 2007 की सर्दियों की बात है। वे सुबह मेरे स्टूडियो आये थे । उनकी आँखों की कशिश को केमरे में उतारने के लिए मैंने उन्हें बहुत देर इधर उधर किया रौशनी का इंतजार किया । वे बड़ी सहजता से वह सब करते रहे जो मैं कहता रहा। उन्होंने यह निशानी मुझे दी । ऐसी ही कई निशानियाँ मेरे भावुक और भौतिक बस्ते में हैं। आप हमेशा याद रहेंगे साथ रहेंगे।
बाबूशा कोहली ने लिखा
आप मानें या न मानें ख़ौफ़ होता है उजाले का
एकदम से कहाँ नज़र टिक पाती सूरज पर मन की मोटी परतें तक कंपकंपा देते साँवली आत्मा को ढाँपे हुए उजले कफ़न
मुझे तो दीये से डर लगता है मशाल से डर लगता है चूल्हे की, चिता की, चित्त की आग से डर लगता है चकाचक चकोर की चाह से डर लगता है चमचम चाँद काटता चिकोटी पूछता सवाल – अरे ! ओ इनसोम्निया के बेबस शिकार ! तुमको आख़िर किस-किस बात से डर लगता है ?
क्या कहूँ झक्क सफ़ेद नमक चखे बैठे प्रेम का जबकि हज़ार किसिम के स्वाद ललचाते सोंधे-सोंधे स्वप्न लुभाते थरथराते चुल्लू भर वचनों में डूब के मर जाते कि मुझे तो नमक की वफ़ा भरी उजास से डर लगता है
आत्महत्या की हद तक ललचाता धुआँधार का उजेला उस चाँदी के असभ्य प्रपात से डर लगता है
उजाले से डर के मेरे क़िस्से न पूछो ‘ज्ञानरंजन’ की दाढ़ी के उजले बाल से डर लगता है
बाबुषा रचना वर्ष : 2015
हेमलता महिश्वर ने लिखा :
ज्ञानरंजन जी नहीं रहे! 89 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हुआ. जहां तक याद आ रहा, उनसे पहली मुलाकात छात्र-जीवन में ही हुई थी. एम ए. करते समय उनकी तकरीबन सारी कहानियां पढ़ गया था. सन् साठ और सत्तर के दशक में जिन कहानीकारों ने हिंदी के युवा पाठकों को सर्वाधिक प्रभावित किया, उनमें ज्ञानरंजन जी निश्चय ही प्रमुख थे. लेकिन ‘पहल’ के संपादक के रूप में ज्ञान जी का योगदान अप्रतिम है. निश्चय ही इस पत्रिका का हिंदी के साहित्य और विचार जगत में महत्वपूर्ण योगदान रहा है. हाल के वर्षों में ज्ञान जी से मुलाकात नहीं हुई. लेकिन दो-ढाई साल पहले फोन पर अच्छी चर्चा हुई थी. 2023 में एक बार जबलपुर जाना हुआ. दिल्ली से चलते समय सोचा था कि जबलपुर में अपने व्याख्यान के बाद सबसे पहले ज्ञान जी के घर जाऊंगा. जबलपुर एयरपोर्ट से होटल जाते समय अपने मेजबान से मैने शाम का यह कार्यक्रम तय भी कर लिया. लेकिन होटल पहुंच कर एक स्थानीय लेखक-मित्र से पता चला कि ज्ञान जी और सुनैना जी स्वास्थ्य कारणों से नागपुर गये हुए हैं. कुछ दिन बाद ज्ञान जी से फोन पर लंबी बातचीत हुई. इलाहाबाद, दिल्ली, जबलपुर और नागपुर सबका संदर्भ आया. आज उनके निधन की ख़बर से मन खिन्न है. सादर श्रद्धांजलि
रवीन्द्र त्रिपाठी ने लिखा
अमूमन दोस्तो या प्रिय लेखकों या कलाकारों के निधन पर पोस्ट नहीं लिखता। मन इतना भर जाता है कि लिखते नहीं बनता। लेकिन ज्ञानरंजन के निधन के बाद ये लिख रहा हूं। इसलिए कि रात में जब सोशल मीडिया पर खबर देखी तो अवसन्न रह गया। पर रात में कुछ नहीं लिखा। पर ऱात भर बैचेन भी रहा और अब लिख रहा हूं। इसलिए कि मन के भीतर अफसोस को जरा कम कर सकूं। अफसोस इसका कि इस बार यानी दिसंबर 2025 में 27 और 28 दिसंबर को जबलपुर में ही था। विनय अंबर -सुप्रिया अंबर के कार्यक्रम में भाग लेने। पर ज्ञान जी से मिल नहीं सका। चाहता था। शोभा अक्षर के साथ मिलकर योजना भी बनी। लेकिन वक्त नहीं मिला। उसे दूसरे दिन ही आना था इसलिए समय की कमी थी।
ज्ञान जी से पहली मुलाकात चालीस साल पहले हुई। मेरी एक सहपाठी उनके ऊपर शोध कर रही थी। ज्ञान जी उससे मिलने आए थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट्स फैकल्टी के लॉन पर मुलाकात हई। फिर और ज्यादा मुलाकातें होती रही। मंगलेश डबराल और विश्व मोहन बडोला के यहां। पहली बार ज्ञान जी ने ही मुझे जबलपुर बुलाया। उसी समय यानी चालीस साल पहले की बात है। प्रगति शील लेखक संघ का सम्नेलन था। हालांकि मैं उस समय न उसका सदस्य था और न आज भी किसी लेखक संघ का सदस्य हूं। मैंने ज्ञान जी को कहा भी कि मै तो प्रलेस का सदस्य नहीं हूं। उन्होने कहा – कोई बात नही आ जाओ,मै तु्महारा रिजर्वेशन करा रहा हूं। बाद में मालूम हुआ कि रिजर्वेशन उन्होंने केदार नाथ सिंह का कराया था। लेकिन वे किसी कारण जा नहीं रहे थे तो ज्ञान जी एवज मेंं मुझे बुला लिया। एक टिकट खराब न हो ये भी विचार रहा होगा। ट्रैन में विश्व नाथ त्रिपाठी और पुरुषोत्तम अग्रवाल भी साथ थे क्योंकि टिकट साथ में था। इन दोनों ने ही टीटी को विश्वास दिलाया कि मैं ही केदार नाथ सिंह हूं और रिजर्वेशन करने वाले क्लर्क की गलती से मेरी उम्र ज्यादा लिखी हुई है। टीटी की आखों से लग रहा था उसे विश्वास नहीं हो रहा है। फिर भी किया। मैं निष्कंटक जबलपुर पहूुंच गया। तीन साल पहले जब विनय अंबर के जलम कार्यक्रम में जबल पुर गया तब ज्ञान जी से मिलने गया। गर्मजोशी से मिले। साथ में प्रियदर्शन भी थे। लंबी बात हुई। उसी दौरान उन्होंने बताया था कि बहिर्गमन' कहानी निर्मल वर्मा और श्रीकांत वर्मा पर लिखी गई थी। और भी बहुत बातें हुईं थी। पिछले दिनों जब संगत में दिए उनके इंटरव्यू को लेकर एक विवाद हुआ तब भी फोन पर उनसे बात हई। मैं वैचारिक रूप से उनके साथ खड़ा था। तब भी लिखा था कि ज्ञान जी का योगदान हिंदी साहित्य में नामवर सिंह से बड़ा है। आज भी इस पर कायम हूं। नामवर जी का योगदान भी है। लेकिन अकादमिक। साहित्यिक योगदान तो ज्ञान जी का ही बड़ा है। हालांक साहित्य की राजनीति दोनों करते थे।लेकिन उसमे नामवर जी बाजी मार ले गए थे। पर कहानीकार को रूप में ज्ञान जी का योगदान बहुत बड़ा है। हिंदी साहित्य में अमिट। ज्ञान जी हिंदी में अनोेखे कहानीकार और पहलसंपादक’ के रूप में हमेशा याद ऱखे जाएंगे।