आज से चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो चुका है। मंदिरों में घंटों की गूंज है, कलश स्थापना हो रही है और ‘शक्ति’ के नौ रूपों की आराधना का संकल्प लिया जा रहा है। लेकिन इस आध्यात्मिक उल्लास के बीच एक गहरा विमर्श यह भी है कि क्या हमारी यह आस्था केवल मूर्तियों और अनुष्ठानों तक सीमित है, या हम वास्तविक जीवन में भी उस ‘मातृका शक्ति’ को सम्मान दे पा रहे हैं?
इतिहास और मिथकों में मातृका सत्ता
इतिहास के पन्नों को पलटें तो समझ आता है कि ‘मातृका’ या देवी की अवधारणा केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक सीमित नहीं रही। प्राचीन रोमन और ग्रीक सभ्यताओं में भी देवियों को उतनी ही संप्रभुता और शक्ति प्राप्त थी, जितनी हमारी नवदुर्गाओं को। यह इस बात का प्रमाण है कि मानव सभ्यता के शुरुआती दौर में स्त्री को ‘गौण’ नहीं, बल्कि ‘सृजक और रक्षक’ के रूप में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। भारत में नवरात्रि का पर्व हमें उसी आदिम गौरवशाली युग की याद दिलाता है, जहाँ पुरुष प्रधानता से पूर्व स्त्री सत्ता का वर्चस्व था।
ऋतु परिवर्तन, आयुर्वेद और व्रत का वैज्ञानिक आधार
नवरात्रि का आयोजन साल में दो बार (चैत्र और अश्विन) होना महज इत्तेफाक नहीं है। यह समय ‘ऋतु संधिकाल’ का होता है, जब मौसम बदलता है और शरीर में वात, पित्त एवं कफ का संतुलन बिगड़ने से बीमारियां बढ़ती हैं। हमारी प्राचीन आयुर्वेदिक परंपरा ने इसीलिए इन दिनों में ‘लंघन’ यानी व्रत का विधान किया, ताकि शरीर शुद्ध हो सके। हालांकि, कालांतर में जब वैष्णव संप्रदाय का प्रभाव बढ़ा, तो इन पर्वों को रामनवमी और विजयादशमी जैसे प्रसंगों से जोड़ दिया गया, जिससे शक्ति पूजा के साथ-साथ मर्यादा और विजय के मानवीय आदर्श भी जुड़ गए।
पूर्वोत्तर भारत: जहाँ पूजा नहीं, सम्मान परंपरा है
स्त्री सशक्तीकरण की असली मिसाल देखनी हो, तो हमें मैदानी इलाकों से निकलकर पूर्वोत्तर भारत (Meghalaya, Mizoram, Manipur) की ओर देखना होगा। दिलचस्प बात यह है कि जहाँ उत्तर भारत में भव्य पंडालों में देवी की पूजा होती है, वहीं मेघालय जैसे राज्यों में नवरात्रि का वैसा प्रचलन नहीं है। बावजूद इसके, वहां की महिलाएं सामाजिक और आर्थिक रूप से उत्तर भारत की तुलना में कहीं अधिक स्वतंत्र हैं।
- मातृसत्तात्मक समाज: मेघालय में आज भी विरासत की चाबी सबसे छोटी बेटी के पास होती है।
- आर्थिक रीढ़: वहां बाजार से लेकर घर के फैसलों तक में महिलाओं की सीधी भागीदारी है।
- सुरक्षा का भाव: दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों में जो असुरक्षा महिलाएं रात में महसूस करती हैं, वैसी स्थिति पूर्वोत्तर के समाज में नहीं है। वहां स्त्री को ‘पूजने’ की औपचारिकता के बजाय ‘जीने’ की आजादी दी गई है।
आधुनिक चुनौतियाँ और वर्चस्ववादी सोच
आज हम एक विरोधाभास में जी रहे हैं। एक ओर हम कन्या पूजन करते हैं, तो दूसरी ओर भ्रूण हत्या जैसे कलंक से समाज पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। कॉर्पोरेट जगत हो या राजनीति, आज भी एक महिला बॉस के अधीन काम करने में कई पुरुषों का ‘अहम’ आड़े आता है। मैदानी शहरों में बढ़ती छेड़खानी की घटनाएं दरअसल उसी वर्चस्ववादी सोच का परिणाम हैं, जो स्त्री को बराबरी का हकदार नहीं मानती।
निष्कर्ष: कर्म ही असली पूजा है
नवरात्रि का वास्तविक मर्म तभी सार्थक होगा जब हम देवी की प्रतिमा के सामने सिर झुकाने के साथ-साथ अपने घर, ऑफिस और समाज की ‘जीवित देवियों’ को उनके अधिकार देंगे। स्त्री को पुरुषों पर निर्भर रहने की बेड़ियों से मुक्त करना ही सच्ची भक्ति है। जब महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र होंगी और समाज उन्हें सुरक्षा का भरोसा देगा, तभी वे सही मायने में ‘देवी स्वरूपा’ होकर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकेंगी।
इस नवरात्रि, आइए केवल उपवास न रखें, बल्कि स्त्री के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने का संकल्प भी लें।