भिंड। मध्य प्रदेश के भिंड से सामने आई साधुओं की बेरहमी से पिटाई की घटना ने अब मानवाधिकार (Human Rights) और कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरेराह दो व्यक्तियों को पकड़कर उनकी धार्मिक पहचान का सबूत मांगना और जवाब न मिलने पर उनके साथ हिंसक व्यवहार करना, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन माना जा रहा है।
घटना देहात थाना क्षेत्र की है, जहां कुछ युवकों ने भिक्षा मांग रहे दो साधुओं को रोककर उनसे रामायण की चौपाइयां और महाभारत के पात्रों के नाम पूछे। जब वे जवाब नहीं दे पाए, तो उनके बैग की तलाशी ली गई। झोले से उर्दू भाषा में लिखे दस्तावेज मिलने पर युवकों का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने कानून को हाथ में लेते हुए साधुओं की जमकर धुनाई कर दी।
क्या कहता है कानून और मानवाधिकार? मानवाधिकार विशेषज्ञों का तर्क है कि किसी भी व्यक्ति की पहचान संदिग्ध होने पर उसे पुलिस के हवाले करना ही एकमात्र कानूनी रास्ता है। सरेआम मारपीट करना न केवल अपराध है, बल्कि यह किसी व्यक्ति के सम्मान के साथ जीने के अधिकार (Article 21) का भी हनन है। यदि वे ‘ढोंगी’ भी थे, तो भी शारीरिक हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता।
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। एक पक्ष इसे धर्म की रक्षा बता रहा है, तो वहीं दूसरा पक्ष इसे ‘मॉब लिंचिंग’ जैसी मानसिकता करार दे रहा है। फिलहाल पुलिस वीडियो के आधार पर जांच कर रही है, लेकिन यह मामला अब धार्मिक पहचान बनाम नागरिक अधिकारों की बड़ी बहस में तब्दील हो गया है।