सिडनी: दूसरी यात्रा में खुलते हुए अर्थ

ऑस्ट्रेलिया से प्रधान संपादक सुभाष मिश्र

दूसरी यात्राओं की एक खासियत होती है—पहली बार चीज़ें चौंकाती हैं, दूसरी बार वे सवाल करने लगती हैं। इस बार मैं ऑस्ट्रेलिया को देखने नहीं, उसे समझने आया हूँ—एक ऐसे भारतीय की निगाह से, जो भारत में रहता है और यहीं लौटने वाला है।
प्रसंगवश निदा फ़ाज़ली साहब की ग़ज़ल के ये शेर याद आते हैं -

नईं- नईं आँखें हों तो हर मंजर अच्छा लगता है 
कुछ दिन शहर में घूमें लेकिन अब घर अच्छा लगता है 
हम ने भी सो कर देखा नए पुराने शहरों में 
जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है ।

सिडनी की सुबहें जल्दी शुरू होती हैं, लेकिन बिना हड़बड़ी के। लोग समय पर निकलते हैं, पर जल्दबाज़ी में नहीं। इस बार मैं अपनी छोटी बेटी के घर ठहरा हूँ। रात में वह बर्तन साफ करती है, घर की सफ़ाई AI-आधारित क्लीनिंग मशीन से होती है। यहाँ पति–पत्नी घरेलू काम आपसी सहयोग से करते हैं। रसोई केवल स्त्रियों की ज़िम्मेदारी नहीं मानी जाती। समय, परिस्थिति और उपलब्धता के अनुसार काम बाँटे जाते हैं। किसी काम को लेकर किसी को जज नहीं किया जाता। हर श्रम का अपना सम्मान और महत्व है।

शायद इसकी जड़ में यह सच है कि ऑस्ट्रेलिया में श्रम महँगा है, इसलिए श्रम का सम्मान है। यहाँ अमीर और सामान्य नागरिक के जीवन में दिखावटी दूरी दिखाई नहीं देती। अच्छे इलाकों में रहने वाले लोग भी खुद लॉन की घास काटते हैं, कचरा बाहर रखते हैं और अपनी कार धोते हैं। शुरू में यह दृश्य अटपटा लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यह बराबरी का पाठ पढ़ाने लगता है।

ऑस्ट्रेलियन ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के अनुसार 2026 में ऑस्ट्रेलिया की कुल आबादी लगभग 2.82 करोड़ है। न्यूनतम मज़दूरी 24.95 डॉलर प्रति घंटा है, यानी 38 घंटे के सप्ताह के हिसाब से लगभग 948 डॉलर। भारत में जहाँ न्यूनतम मज़दूरी अलग-अलग राज्यों में 200 से 400 रुपये प्रतिदिन है, वहाँ घरेलू नौकर रखना सामान्य बात है। यहाँ यह व्यावहारिक नहीं। इसलिए आत्मनिर्भरता यहाँ मजबूरी नहीं, बल्कि जीवनशैली है।

ऑस्ट्रेलिया को अक्सर ‘डाउन अंडर’ कहा जाता है, क्योंकि यह दक्षिणी गोलार्ध में स्थित है। लेकिन यहाँ की ज़िंदगी ऊपर से नीचे तक एक संतुलित सहजता से भरी हुई है। कंगारू, कोआला और क्रिकेट इसकी पहचान हैं, पर असली पहचान श्रम के सम्मान और सामाजिक बराबरी से बनती है।

यहाँ की जीवनशैली प्रकृति से लगातार संवाद करती हुई लगती है। सिडनी के बीचोंबीच समंदर है, पार्क हैं, वॉकिंग ट्रैक्स हैं। बॉन्डी बीच केवल पर्यटक स्थल नहीं, बल्कि शहर की सामूहिक साँस है—सुबह सर्फ़िंग, शाम को वॉक और सप्ताहांत में परिवारों की चहल-पहल। सब कुछ सहज और स्वाभाविक।

मौसम भी इस जीवनशैली के अनुकूल है—गर्मियाँ तीखी नहीं, सर्दियाँ ज़्यादा कठोर नहीं। लेकिन सबसे खास है यहाँ का “नो वरीज़” एटिट्यूड। लोग काम करते हैं, लेकिन काम जीवन को निगलता नहीं। फेयर वर्क कमीशन के नियमों के अनुसार कर्मचारियों को सालाना चार हफ्ते की छुट्टी मिलती है, ओवरटाइम पर अतिरिक्त भुगतान होता है और सामान्य कार्य-सप्ताह 38 घंटे का है। भारत में जहाँ 12–14 घंटे काम करना सामान्य माना जाता है, यहाँ संतुलन को समझदारी समझा जाता है। एक स्थानीय मित्र ने मुझसे कहा था—“मेट, लाइफ इज़ टू शॉर्ट फॉर स्ट्रेस।”

इस दूसरी यात्रा में शहरों को भी मैं अलग नज़र से देख रहा हूँ। ऑस्ट्रेलिया भौगोलिक रूप से विशाल है, लेकिन आबादी मुख्यतः शहरों में केंद्रित है। 2026 के अनुमानों के अनुसार सिडनी सबसे बड़ा शहर है, जहाँ लगभग 5.31 मिलियन लोग रहते हैं। यह न्यू साउथ वेल्स की राजधानी है और ओपेरा हाउस व हार्बर ब्रिज इसकी वैश्विक पहचान हैं। ट्रैफिक ज़रूर है, लेकिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट बेहद प्रभावी है।

ऑस्ट्रेलिया के अलग-अलग इलाकों में विशाल वेयरहाउस दिखाई देते हैं। ये केवल दुकानें नहीं, बल्कि पूरी गृहस्थी का भंडार हैं। कील से लेकर घर बनाने, घर में रहने और बगीचे तक की हर ज़रूरत का सामान एक ही जगह उपलब्ध होता है—पेड़-पौधे, कुर्सी-टेबल, औज़ार, नट-बोल्ट, पानी की पेंचिस तक। अगर आप एक बार वेयरहाउस में प्रवेश कर लें, तो समझिए आपकी पूरी गृहस्थी का सामान वहीं मिल जाएगा।

इसकी वजह यह है कि यहाँ के लोग अपने घरेलू काम खुद करते हैं। हमारे यहाँ जैसे बढ़ई, मैकेनिक, प्लंबर, लोहार, इलेक्ट्रीशियन या माली को बुलाने की परंपरा है, वैसी व्यवस्था यहाँ नहीं है। लोग खुद सामान खरीदते हैं, फिटिंग करते हैं, बगीचे की निंदाई-गुड़ाई और पेड़-पौधों की देखभाल स्वयं करते हैं। मैंने दो-तीन ऐसे वेयरहाउस देखे, जिनका आकार हमारे यहाँ FCI के उन गोदामों जैसा है, जहाँ धान, गेहूँ या खाद रखी जाती है। घरेलू काम की सामग्री के लिए इतने बड़े स्टोरेज अपने आप में एक बड़ी बात है।

इसी क्रम में मैंने कई घरों के सामने से गुज़रते हुए देखा कि उनके गार्डन कितने व्यवस्थित हैं। पौधों की कटिंग इतनी सलीके से की गई होती है कि देखना सुखद लगता है। इनका मेंटेनेंस घर में रहने वाले लोग खुद करते हैं। पब्लिक गार्डन, खेल के मैदान, सड़कों के किनारे और आसपास की खाली जगहें भी बेहद साफ़-सुथरी और व्यवस्थित हैं। स्थानीय काउंसिल इन्हें बहुत सिस्टमैटिक तरीके से संभालती है। जगह-जगह जंगलनुमा पेड़-पौधों को भी यथावत रखा गया है। हमारे यहाँ अक्सर यह सोच होती है कि केवल रिज़र्व फॉरेस्ट में ही पेड़ सुरक्षित रहेंगे, लेकिन यहाँ हर जगह प्रकृति को बचाकर रखा गया है। ऐसा दृश्य हमारे देश में दुर्लभ है।

पर्यावरण और प्रकृति को लेकर यहाँ नागरिकों में गहरी जागरूकता है। कोई भी अपने घर का कचरा सार्वजनिक स्थान पर नहीं डालता। कचरा डालने का दिन तय होता है और उसी दिन कचरा बाहर रखा जाता है। बाहर लगे फल-फूल कितने ही सुंदर क्यों न हों, कोई दूसरे के पौधों को नहीं तोड़ता। अपनी कैंपस कॉलोनी में इस बात को लेकर हमें रोज़ जद्दोजहद करनी पड़ती है।

मेलबर्न, जिसकी आबादी लगभग 5.46 मिलियन है, अपनी कॉफी संस्कृति, स्ट्रीट आर्ट और खेल आयोजनों के लिए जाना जाता है। ब्रिस्बेन में 2.6 मिलियन लोग रहते हैं और वहाँ की नदी-किनारे की जीवनशैली अलग ही रंग देती है। पर्थ खनन उद्योग का केंद्र है, जबकि एडिलेड वाइन और फेस्टिवल्स के लिए प्रसिद्ध है। कुल मिलाकर देश की लगभग 86 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है।

प्रवासियों के बिना आधुनिक ऑस्ट्रेलिया की कल्पना संभव नहीं। कुल आबादी का लगभग 31.5 प्रतिशत हिस्सा विदेशी-जन्मे लोगों का है—यानी 8.6 मिलियन से अधिक। भारतीय समुदाय यहाँ सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है। 2024 में भारतीय-जन्मे लोगों की संख्या लगभग 9.16 लाख थी और 2026 तक इसके 10 लाख के पार जाने का अनुमान है। सिडनी और मेलबर्न में भारतीय रेस्तरां, ग्रॉसरी स्टोर्स और दिवाली-होली जैसे त्योहार आम दृश्य हैं।

चीनी-जन्मे लोग लगभग 7 लाख हैं और चाइनाटाउन जैसे इलाकों में उनका सांस्कृतिक प्रभाव स्पष्ट दिखता है। ब्रिटेन, न्यूज़ीलैंड और फिलीपींस से आए समुदाय भी बड़ी संख्या में हैं। दिलचस्प यह है कि यहाँ भेदभाव अपेक्षाकृत कम है, लेकिन पढ़ाई को लेकर भारतीय और चीनी परिवार अधिक गंभीर दिखते हैं, जबकि स्थानीय ऑस्ट्रेलियाई अपेक्षाकृत रिलैक्स्ड।

शिक्षा व्यवस्था यहाँ सामाजिक भरोसे की रीढ़ है। अच्छे स्कूलों में प्रवेश मेरिट या लोकल एरिया के आधार पर होता है। इसी कारण अच्छे स्कूल ज़ोन वाले इलाकों में घर महँगे हैं। सिडनी में ऐसे इलाकों में किराया 800 से 1000 डॉलर प्रति सप्ताह तक हो सकता है। भारत में जहाँ अच्छी शिक्षा का अर्थ निजी स्कूल होता है, यहाँ सरकारी स्कूल ही गुणवत्ता का प्रतीक हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी और मेलबर्न यूनिवर्सिटी जैसी संस्थाएँ विश्व रैंकिंग में शीर्ष पर हैं।

बिज़नेस के लिहाज़ से ऑस्ट्रेलिया छोटे उद्यमों के लिए अनुकूल देश है। ऑस्ट्रेलियन बिज़नेस नंबर का पंजीकरण मुफ़्त है। 75,000 डॉलर से अधिक टर्नओवर पर GST पंजीकरण ज़रूरी है। टैक्स दरें ऊँची हैं—30 से 40 प्रतिशत तक—लेकिन इसके बदले हेल्थकेयर, पेंशन और बेरोज़गारी भत्ता जैसी सामाजिक सुरक्षा मिलती है। अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि, खनन और सर्विस सेक्टर पर आधारित है।

ऑस्ट्रेलियाई समाज की आत्मा ‘मेटशिप’ में बसती है—बराबरी, दोस्ती और सहजता। लोग सड़क पर मुस्कराकर ‘G’day’ कहते हैं। व्यंग्यात्मक हास्य यहाँ की खासियत है। बॉस और कर्मचारी के बीच सामाजिक दूरी कम है। खेल यहाँ संस्कृति का हिस्सा हैं—क्रिकेट, रग्बी, AFL और टेनिस। मेलबर्न में ऑस्ट्रेलियन ओपन के दौरान पूरा शहर उत्सव में डूब जाता है।

मीडिया अपेक्षाकृत स्वतंत्र और विश्वसनीय है। ABC और SBS जैसे सार्वजनिक प्रसारक गंभीर और संतुलित माने जाते हैं। The Sydney Morning Herald, The Australian और The Age जैसे अख़बारों पर लोगों का भरोसा है।

सांस्कृतिक गतिविधियाँ यहाँ जीवन का अहम हिस्सा हैं। Vivid Sydney, Mardi Gras, Adelaide Fringe और NAIDOC Week जैसे आयोजन बहुसांस्कृतिक पहचान को खुलकर सामने लाते हैं।

इतिहास की दृष्टि से आधुनिक ऑस्ट्रेलिया नया देश है, लेकिन इसके मूल निवासी एबोरिजिनल लोग 65,000 वर्षों से यहाँ रहते आए हैं। ड्रीमटाइम संस्कृति और कला आज भी सामाजिक विमर्श का हिस्सा हैं। आधुनिक ऑस्ट्रेलिया धीरे-धीरे इस ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकारने और सुधारने की कोशिश कर रहा है।

फिल्म और टीवी इंडस्ट्री आकार में छोटी होते हुए भी अंतरराष्ट्रीय प्रोडक्शन्स का बड़ा केंद्र है। Mad Max, Crocodile Dundee और Neighbours जैसी रचनाएँ इस समाज की पहचान बन चुकी हैं।

कुल मिलाकर, इस दूसरी यात्रा में मैंने यह महसूस किया है कि ऑस्ट्रेलिया कोई आदर्श समाज नहीं, लेकिन एक सीखा हुआ समाज ज़रूर है—जो समय, श्रम और व्यक्ति की गरिमा को महत्व देता है। भारत के साथ तुलना अपने-आप होती है। हम रिश्तों में गहरे हैं, वे व्यवस्था में मजबूत।

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