नई दिल्ली। हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का पर्व केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के अनुभव का महापर्व है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी, यानी 15 फरवरी 2026 को मनाई जाने वाली इस रात को साल की सबसे शक्तिशाली रात माना जाता है। यूँ तो हर महीने ‘मासिक शिवरात्रि’ आती है, लेकिन महाशिवरात्रि का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व सबसे ऊपर है।
आइए समझते हैं कि इस रात में ऐसा क्या खास है जो इसे ‘महा’ बनाता है:
शिव और शक्ति का अलौकिक मिलन
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। इसे ‘पुरुष’ और ‘प्रकृति’ के मिलन की रात कहा जाता है। शिव, जो वैराग्य के प्रतीक हैं, उन्होंने इसी रात गृहस्थ जीवन को अपनाकर संसार के संतुलन को साधा था।
ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य
शिव पुराण के वर्णन के अनुसार, महाशिवरात्रि की आधी रात को ही भगवान शिव एक विशाल अग्नि स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में प्रकट हुए थे। इस अनंत ऊर्जा स्तंभ का न कोई आरंभ था और न ही अंत। इसी कारण इस रात को करोड़ों सूर्यों के तेज के समान फलदायी माना गया है।
ऊर्जा का प्राकृतिक उभार (आध्यात्मिक पहलू)
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो महाशिवरात्रि की रात खगोलीय रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। इस रात पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में ऊर्जा का प्रवाह स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर होता है। यही कारण है कि इस रात ‘रीढ़ की हड्डी’ सीधी रखकर जागने और ध्यान करने का विशेष महत्व है, ताकि शरीर के भीतर की ऊर्जा का विकास हो सके।
अज्ञानता के अंत की रात
शिव संहार के देवता हैं, लेकिन वे बुराइयों और अज्ञानता का संहार करते हैं। महाशिवरात्रि की रात किया गया मंत्र जाप और ध्यान अन्य दिनों की तुलना में हजार गुना अधिक प्रभावशाली होता है। इस रात का ‘जागरण’ हमें केवल नींद से नहीं, बल्कि हमारे भीतर के अंधकार से जगाकर सचेत बनाता है।
यदि आप पूरी रात नहीं जाग सकते, तो शास्त्रों के अनुसार ‘निशिता काल’ (अर्धरात्रि का समय) में कम से कम 15-20 मिनट मौन रहकर शिव का ध्यान करना भी आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।