नई दिल्ली: वैवाहिक रिश्तों में अक्सर पैसों के लेन-देन और खर्चों को लेकर तकरार होती है। लेकिन क्या एक पति द्वारा अपनी पत्नी से पाई-पाई का हिसाब मांगना या उसे खर्चों की एक्सेल शीट बनाने को कहना आपराधिक क्रूरता (Section 498A) के दायरे में आता है? इस महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट कर दी है।
अदालत का फैसला: हिसाब मांगना क्रूरता नहीं जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने 19 दिसंबर 2025 को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी पर आर्थिक नियंत्रण रखना या उसे खर्चों का रिकॉर्ड रखने के लिए कहना अपने आप में ‘आपराधिक क्रूरता’ नहीं है। कोर्ट के अनुसार, जब तक इस व्यवहार से पत्नी को कोई गंभीर मानसिक या शारीरिक नुकसान न पहुँचाया जाए, इसे अपराध नहीं माना जा सकता।
क्या था पूरा मामला? यह मामला अमेरिका में कार्यरत दो सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स से जुड़ा है:
विवाद की शुरुआत: शादी के कुछ साल बाद आपसी मतभेदों के कारण पत्नी भारत लौट आई। जब पति ने उसे साथ रहने के लिए कानूनी नोटिस भेजा, तो पत्नी ने पति और उसके परिवार पर दहेज उत्पीड़न और धारा 498A के तहत केस दर्ज करा दिया।
पत्नी के आरोप: पत्नी का दावा था कि पति खर्च का पूरा हिसाब मांगता था, एक्सेल शीट बनवाने के लिए दबाव डालता था और वजन बढ़ने पर ताने मारता था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: कोर्ट ने माना कि ये आरोप वैवाहिक जीवन के रोजमर्रा के झगड़ों जैसे हैं। पति का व्यवहार ‘असंवेदनशील’ हो सकता है, लेकिन यह ‘आपराधिक’ नहीं है।
498A के दुरुपयोग पर कोर्ट की कड़ी चेतावनी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दहेज विरोधी कानूनों (498A) का इस्तेमाल निजी रंजिश निकालने या बदला लेने के हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप सामान्य थे और उनके पास दहेज मांगने का कोई ठोस सबूत या तारीख मौजूद नहीं थी।
निष्कर्ष अदालत ने पति के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करते हुए साफ किया कि भारत में पारंपरिक रूप से पुरुष अक्सर वित्त पर नियंत्रण रखते हैं। केवल इसी आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना कानून का गलत इस्तेमाल है। हर गलत व्यवहार या छोटी-मोटी बहस ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं आती।