बस्तर। बस्तर के सघन जंगलों पर इन दिनों ईंट भट्ठों का ग्रहण लग गया है, जहाँ भट्ठा संचालकों द्वारा ईंट पकाने की आड़ में बेशकीमती पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है। पर्यावरण संरक्षण के तमाम सरकारी दावे और नियम यहाँ कागजों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। स्थिति यह है कि इंद्रावती नदी के किनारों पर ही 200 से अधिक अवैध भट्ठे संचालित होने की जानकारी सामने आ रही है, जहाँ दिन-रात आम, तेंदू, महुआ, अर्जुन और बबूल जैसे पेड़ों को आग में झोंका जा रहा है।
जानकारी के मुताबिक, धान का भूसा महंगा होने की वजह से भट्ठा संचालकों ने पेड़ों की लकड़ियों को सस्ता विकल्प बना लिया है। इसके लिए न केवल वन क्षेत्रों के भीतर अवैध रूप से भट्ठों का संचालन किया जा रहा है, बल्कि ग्रामीणों को भी उनके निजी पेड़ों को बेचने के लिए उकसाया जा रहा है। नियमों के अनुसार लाल ईंट के निर्माण पर कड़े प्रतिबंध के बावजूद, ठेकेदारों और संचालकों की सांठगांठ से यह काला कारोबार धड़ल्ले से फल-फूल रहा है।
सबसे चिंताजनक पहलू स्थानीय प्रशासन और वन विभाग की रहस्यमयी चुप्पी है। जिम्मेदार विभागों की इस निष्क्रियता के चलते क्षेत्र का पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम) पूरी तरह बिगड़ रहा है। यदि समय रहते इन अवैध भट्ठों और वनों की कटाई पर लगाम नहीं कसी गई, तो बस्तर के पर्यावरण को होने वाले इस नुकसान की भरपाई भविष्य में नामुमकिन होगी।