छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का अहम फैसला: बिना पेनिट्रेशन इजैक्युलेशन ‘रेप की कोशिश’, रेप नहीं

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े एक 20 साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेशन को रेप नहीं माना जा सकता, हालांकि इसे रेप की कोशिश की श्रेणी में रखा जाएगा।

यह फैसला जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने वासुदेव गोंड बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में सुनाया। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सात साल की सजा को घटाकर तीन साल छह महीने कर दिया है और दोषी को दो महीने के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया है।


क्या था मामला?

यह मामला वर्ष 2004 का है। ट्रायल कोर्ट ने 2005 में आरोपी को IPC की धारा 376 के तहत दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने माना था कि आरोपी ने पीड़िता की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध स्थापित किया।

हाई कोर्ट में दायर अपील पर सुनवाई के दौरान पीड़िता के बयान और मेडिकल साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण किया गया।


पीड़िता के बयान में विरोधाभास

क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान पीड़िता ने कहा कि आरोपी ने अपना निजी अंग उसकी योनि के ऊपर रखा था, लेकिन पेनिट्रेशन नहीं किया। बाद में दिए गए बयान में उसने पार्शियल पेनिट्रेशन की संभावना भी जताई।

अदालत ने कहा कि रेप के अपराध के लिए “पेनिट्रेशन” आवश्यक तत्व है, न कि “इजैक्युलेशन”। केवल इजैक्युलेशन होने से दुष्कर्म सिद्ध नहीं होता, जब तक पेनिट्रेशन के ठोस और स्पष्ट प्रमाण न हों।


मेडिकल रिपोर्ट पर कोर्ट की टिप्पणी

मेडिकल जांच में पीड़िता का हाइमन सुरक्षित पाया गया। डॉक्टर ने बयान में कहा कि एक उंगली का सिरा अंदर डाला जा सकता था और पार्शियल पेनिट्रेशन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि मेडिकल साक्ष्य निर्णायक रूप से दुष्कर्म साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। हालांकि, आरोपी के कृत्य यह दर्शाते हैं कि उसने यौन अपराध को अंजाम देने की कोशिश की थी।


अदालत का कानूनी विश्लेषण

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि IPC की धारा 375 के तहत “हल्का पेनिट्रेशन” भी रेप के लिए पर्याप्त हो सकता है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट और विश्वसनीय प्रमाण जरूरी हैं कि आरोपी का कोई हिस्सा महिला के जननांग के भीतर गया हो।

अदालत ने कहा कि इस मामले में आरोपी द्वारा पीड़िता को जबरन कमरे में ले जाना, दरवाजा बंद करना, दोनों का निर्वस्त्र होना और शारीरिक संपर्क बनाना—ये सभी कृत्य अपराध की तैयारी से आगे बढ़ चुके थे और अपराध के प्रयास की श्रेणी में आते हैं।

इस आधार पर अदालत ने धारा 375 के साथ धारा 511 IPC के तहत “रेप की कोशिश” का अपराध सिद्ध माना।


सजा में राहत और सेट-ऑफ

कोर्ट ने सजा घटाकर तीन साल छह महीने कर दी। साथ ही कहा कि आरोपी को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 428 (या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 468) के तहत पूर्व में जेल में बिताई अवधि का सेट-ऑफ मिलेगा।

रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी ट्रायल के दौरान लगभग एक वर्ष एक माह चार दिन जेल में रह चुका है।


पक्षकारों की दलील

दोषी की ओर से अधिवक्ता राहिल अरुण कोचर और लीकेश कुमार ने पैरवी की, जबकि राज्य की ओर से अधिवक्ता मनीष कश्यप ने पक्ष रखा।


फैसले का महत्व

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि दुष्कर्म के मामलों में पेनिट्रेशन का प्रश्न केंद्रीय है और केवल इजैक्युलेशन से दुष्कर्म सिद्ध नहीं होता। हालांकि, ऐसे कृत्य को गंभीर अपराध मानते हुए अदालत ने इसे “रेप की कोशिश” की श्रेणी में रखा है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला यौन अपराधों की व्याख्या और साक्ष्यों के मूल्यांकन को लेकर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।

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