सत्ता के साए में अवैध धंधा उजागर

भाजपा नेता के ढाबे में शराब बिक्री का भंडाफोड़, पुलिस की दबिश से मचा हड़कंप

कांकेर। नशे के खिलाफ बड़े-बड़े दावे करने वाली भाजपा की कथनी और करनी के बीच एक बार फिर गहरी खाई उजागर हुई है। इस बार मामला सीधे भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के जिलाध्यक्ष ईश्वर कावड़े से जुड़ा है, जिनके ढाबे में खुलेआम अवैध शराब बेचे जाने का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। कांकेर पुलिस की देर शाम हुई कार्रवाई ने पूरे जिले की राजनीति में भूचाल ला दिया है।

सूत्रों के अनुसार, लंबे समय से शिकायतें मिल रही थीं कि शहर से लगे इलाके में संचालित इस ढाबे में नियमों को ताक पर रखकर अवैध शराब परोसी जा रही है। आखिरकार पुलिस ने सख्ती दिखाते हुए दबिश दी, जहां मौके पर शराब बिक्री के प्रमाण मिले। कार्रवाई के दौरान अवैध शराब जब्त की गई और मौके पर मौजूद लोगों से पूछताछ की गई।

राजनीतिक संरक्षण में फल-फूल रहा था गोरखधंधा?

सबसे गंभीर सवाल यह है कि आखिर इतने लंबे समय से यह अवैध कारोबार किसके संरक्षण में चल रहा था। जिस व्यक्ति पर आदिवासी समाज के प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी है, उसी पर कानून तोड़ने का आरोप लगना भाजपा की साख पर सीधा हमला माना जा रहा है।

और मामला यहीं खत्म नहीं होता ईश्वर कावड़े की पत्नी वर्तमान में कांकेर जनपद पंचायत की अध्यक्ष हैं। ऐसे में यह मामला केवल अवैध शराब तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि सत्ता के प्रभाव और दुरुपयोग की आशंकाओं को भी जन्म देता है।

नशे पर सियासत बनाम जमीन की हकीकत

भाजपा लगातार प्रदेश में नशामुक्ति के बड़े-बड़े अभियान और दावे करती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर पार्टी के ही पदाधिकारी इस तरह के धंधों में लिप्त पाए जा रहे हैं, तो सवाल उठना लाजिमी है। क्या यह सिर्फ एक मामला है या फिर यह एक बड़े नेटवर्क की ओर इशारा करता है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस ढाबे में देर रात तक संदिग्ध गतिविधियां चलती थीं और कई बार शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे यह भी संदेह गहराता है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक स्तर पर भी लापरवाही या दबाव काम कर रहा था।

कार्रवाई या लीपापोती?

फिलहाल पुलिस ने कार्रवाई करते हुए शराब जब्त कर ली है, लेकिन अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच होगी या फिर राजनीतिक दबाव में इसे दबाने की कोशिश की जाएगी।

यह मामला केवल एक ढाबे का नहीं, बल्कि कानून के राज और राजनीतिक नैतिकता की असल परीक्षा बन गया है। यदि ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई नहीं होती, तो नशामुक्ति के दावे केवल खोखले नारे बनकर रह जाएंगे।

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