बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम विवाह कानून से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि पति लगातार दो वर्षों तक अपनी पत्नी का भरण-पोषण नहीं करता है, तो पत्नी को तलाक लेने का कानूनी अधिकार है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि पत्नी मायके में रह रही हो, तब भी यह अधिकार बाधित नहीं होगा।
मामले के अनुसार, कोरिया जिले के मनेंद्रगढ़ की रहने वाली महिला का निकाह सितंबर 2015 में हुआ था। वैवाहिक विवाद के कारण वह मई 2016 से अपने मायके में रहने लगी। पत्नी ने आरोप लगाया था कि पति उस पर 10 लाख रुपये की एफडी तुड़वाने का दबाव बना रहा था, जिसके बाद उसने घरेलू हिंसा और भरण-पोषण के मामले दर्ज कराए थे। फैमिली कोर्ट ने इन आधारों पर तलाक की डिक्री जारी की थी, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 की धारा 2(ii) का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि कानून के तहत पत्नी का पति के साथ रहना अनिवार्य नहीं है। रिकॉर्ड के अनुसार, पति ने पिछले आठ वर्षों से पत्नी को किसी भी तरह का गुजारा भत्ता नहीं दिया था। कोर्ट ने इसे तलाक के लिए पर्याप्त आधार माना।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पति की संपत्ति हड़पने के आरोपों से जुड़ी फैमिली कोर्ट की टिप्पणी को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल एफडी तुड़वाने के दबाव के आरोप से संपत्ति का दुरुपयोग साबित नहीं होता है, जब तक कि इसके ठोस सबूत न हों। अंत में, अदालत ने भरण-पोषण न देने के आधार पर तलाक के फैसले को बरकरार रखा और स्पष्ट संदेश दिया कि महिलाओं के भरण-पोषण के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।