जितेंद्र शुक्ला
बेमेतरा शिवनाथ नदी के पावन तट पर बसे गांव—मऊ, तूमा ,झिरिया, बिटकुली और चन्नू—आज अपनी नियति खुद लिखने को मजबूर हैं। विडंबना देखिए कि जिस क्षेत्र की प्यास बुझाने के लिए सामने शिवनाथ बह रही है, वहीं के ग्रामीण आज ‘बाल्टी दर बाल्टी’ मीठे पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
शासन-प्रशासन की फाइलों में भले ही विकास के दावे हों, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यहाँ के किसानों और ग्रामीणों ने अब सरकार से उम्मीद लगाना छोड़ खुद को ‘आत्मनिर्भरता’ के सांचे में ढाल लिया है।
जनसांख्यिकीय उपेक्षा: 5000 की आबादी, फिर भी ‘जनपद’ से दूर
क्षेत्र का प्रमुख केंद्र मऊ लगभग 5000 की आबादी समेटे हुए है। जनसंख्या के मानकों और क्षेत्रीय प्रभाव के लिहाज से इसे अब तक जनपद पंचायत का दर्जा मिल जाना चाहिए था, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक उदासीनता के कारण यह आज भी एक उपेक्षित गांव बनकर रह गया है। मऊ के साथ-साथ तूमा ,झिरिया, बिटकुली और चन्नू जैसे गांवों में साहू, गडरिया, राउत, कुम्हार ,केवट,धोबी,ब्राह्मण और गोड़ समाज के लोग आपसी सौहार्द के साथ रहते हैं, पर विकास की किरण यहाँ तक पहुँचते-पूँछते धुंधली हो जाती है।
जल संकट: नदी किनारे प्यास का पहरा
सबसे दर्दनाक स्थिति पेयजल की है। शिवनाथ नदी का किनारा होने के बावजूद इन गांवों में मीठे पानी की भारी किल्लत है। ग्रामीणों को मीलों दूर से पानी ढोकर लाना पड़ता है। स्थिति यह है कि पानी बाल्टियों में नाप-तौल कर इस्तेमाल हो रहा है। जल जीवन मिशन जैसी बड़ी योजनाएं यहाँ के धरातल पर अब भी अपनी सार्थकता तलाश रही हैं।
सड़क सुधार से जागी उम्मीद, पर मंज़िल अभी दूर
क्षेत्र के लिए राहत की एकमात्र खबर यह है कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनी सड़कें अब पीडी (पीडब्ल्यूडी) रोड में तब्दील हो चुकी हैं। इससे आवागमन तो सुधरा है, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और सिंचाई के संसाधनों के मामले में क्षेत्र अब भी काफी पिछड़ा हुआ है।
गहराता सामाजिक और आर्थिक संकट
गांवों की आत्मनिर्भरता की कहानियों के बीच एक पक्ष बेहद चिंताजनक है। खेती और किसानी पर निर्भर इस क्षेत्र में ब्राह्मण समाज की आर्थिक और सामाजिक दशा लगातार बिगड़ रही है। परंपराओं का निर्वहन करने वाला यह वर्ग आज संसाधनों के अभाव और आय के सीमित साधनों के कारण हाशिए पर आता जा रहा है । आत्मनिर्भरता: विवशता या स्वाभिमान ?
लगातार पड़ते अकाल और प्रशासनिक उपेक्षा ने यहाँ के लोगों का ‘टाइम टेबल’ बदल दिया है। यहाँ के किसान अब सरकारी मदद के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठते। पिछले कुछ वर्षों में आए उतार-चढ़ाव ने इन्हें सिखा दिया है कि अपनी तरक्की का रास्ता खुद ही बनाना होगा।
निष्कर्ष:
तूमा ,झिरिया और मऊ जैसे गांव छत्तीसगढ़ के उन हजारों गांवों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ लोक-संस्कृति और सामर्थ्य तो है, लेकिन प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है। यदि समय रहते मीठे कीपानी की समस्या और मऊ को प्रशासनिक दर्जा देने जैसी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह आत्मनिर्भरता कहीं व्यवस्था के प्रति आक्रोश में न बदल जाए।
ग्राउंड रिपोर्ट: विकास की बाट जोहता शिवनाथ का तटीय क्षेत्र; आत्मनिर्भरता की मिसाल, पर सुविधाओं का अकाल

02
Apr