“सखि, वसंत आया…” – पर यह किस तरह का ‘बसंत’ है?

“सखि, वसंत आया…” - हिंदी साहित्य में यह पंक्ति सुनते ही मन में हरियाली, नवजीवन और उत्साह की छवि उभर आती है। महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने वसंत को प्रकृति के उत्सव के रूप में देखा था जब पेड़ों पर नई कोंपलें फूटती हैं, खेतों में सरसों लहलहाती है और कोयल की कूक से वातावरण में मधुरता भर जाती है।

रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि पदमाकर ने भी इसी उल्लास को शब्दों में पिरोते हुए लिखा-
“वनन में, बागन में, बगरो बसंत है।”
अर्थात जंगलों से लेकर बगीचों तक, हर ओर बसंत की मस्ती और सौंदर्य बिखरा हुआ है।

लेकिन समय के साथ शब्दों के अर्थ भी बदल जाते हैं। आज के दौर में भी एक “बसंत” चर्चा में है पर वह प्रकृति के बागानों में नहीं, बल्कि शहरों की जमीनों, होर्डिंग्स और प्रभाव के गलियारों में खिलता दिखाई देता है।

यह कहानी राजधानी रायपुर के आसपास के इलाकों से उठती एक बहस से जुड़ती है। शहर के नजदीक धरसींवा क्षेत्र के एक गांव में सरकारी जमीनों को लेकर इन दिनों जो विवाद सामने आया है, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि तेजी से शहरी होते भारत में जमीन का खेल आखिर किस दिशा में जा रहा है।

मामले में आरोप हैं कि चारागाह, निस्तारी और जल स्रोत जैसी शासकीय जमीनों पर कब्जा कर उन्हें समतल किया गया और वहां कॉलोनी की तरह प्लॉट काटने की तैयारी की गई। राजस्व जांच में कई खसरा नंबरों जैसे 644, 636, 634, 511/5 और 638 का उल्लेख सामने आया है, जो राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी जमीन के रूप में दर्ज बताए जाते हैं। बताया गया कि करीब 6.39 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाली जमीन में से लगभग 4.51 हेक्टेयर हिस्से में मुरूम डालकर समतलीकरण किया गया और वहां करीब 60 फीट चौड़ी सड़क बनाकर प्लॉटिंग की तैयारी के संकेत मिले।

यहीं से यह कहानी केवल जमीन के विवाद तक सीमित नहीं रहती, बल्कि एक सामाजिक और राजनीतिक कथा में बदलने लगती है।

इस पूरे प्रकरण में जमीन कारोबारी बसंत अग्रवाल का नाम चर्चा में आया है। शहर में उनकी पहचान केवल एक कारोबारी के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक और सामाजिक आयोजनों से जुड़े एक सक्रिय व्यक्ति के रूप में भी बनती रही है। बड़े धार्मिक कार्यक्रमों, भजन संध्या, जन्माष्टमी उत्सव और कथाओं के आयोजनों में उनकी भूमिका अक्सर चर्चा में रही है। इन्हीं आयोजनों में एक अवसर पर बागेश्वर धाम के कथावाचक पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथा के आयोजन से भी उनका नाम जुड़ा रहा, जहां बड़ी संख्या में लोग और कई राजनीतिक हस्तियां भी मौजूद रहीं।

अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते उन्होंने 2018 में साजा विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव भी लड़ा किंतु राजनीति में उनसे भी बड़े खिलाड़ी मौजूद थे जिनसे उन्हें बड़े वोटों के मार्जिन से मात खानी पड़ी।

यही वह बिंदु है जहां साहित्य का वसंत और हमारे समय का वसंत एक दिलचस्प तुलना रचते हैं।

साहित्य में वसंत प्रकृति में आनंद भरता है, लेकिन हमारे समय का यह नया वसंत अक्सर प्रभाव, नेटवर्क और शक्ति के विस्तार से जुड़ा दिखाई देता है। गांव से शहर की ओर आने वाली यह कहानी केवल आर्थिक उन्नति की नहीं होती यह सामाजिक प्रतिष्ठा, धार्मिक मंचों पर उपस्थिति और राजनीतिक आकांक्षाओं की भी कहानी बन जाती है।

अगर हिंदी साहित्य के चर्चित व्यंग्य उपन्यास राग दरबारी के काल्पनिक गांव शिवपालगंज को आज के समय में खोजा जाए, तो उसकी झलक हमें कई कस्बों और शहरों के आसपास के गांवों में दिखाई दे सकती है। फर्क बस इतना है कि वहां की चौपाल की राजनीति अब जमीन, कॉलोनियों और बड़े आयोजनों तक पहुंच चुकी है।

धरसींवा के विवाद ने एक और पहलू को भी चर्चा में ला दिया पत्रकारिता और सवाल पूछने की भूमिका। जमीन से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाने वाले पत्रकार देवेश तिवारी के साथ विवाद और सोशल मीडिया पर कथित धमकी का मामला सामने आने के बाद यह प्रकरण और चर्चित हो गया। बताया गया कि एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान तीखी बहस के बाद यह विवाद बढ़ा और बाद में एक वीडियो के जरिए कथित धमकी का मामला भी सामने आया।

यह घटना केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं है। यह उस बड़े सवाल की ओर भी इशारा करती है कि जब जमीन, पैसा और प्रभाव एक साथ आते हैं तो सार्वजनिक विमर्श कितना सहज रह पाता है।

धरसींवा का यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस व्यापक सामाजिक परिवर्तन की झलक देता है जो पिछले दो-ढाई दशकों में देश के कई शहरों में दिखाई दिया है। शहरीकरण के साथ जमीन की कीमतें तेजी से बढ़ीं, और जमीन का कारोबार केवल कृषि या आवास तक सीमित न रहकर एक बड़े आर्थिक खेल में बदल गया।

इसी दौर में एक नया वर्ग उभरा जिसने जमीन के कारोबार, दलाली, लाइजनिंग और राजनीतिक-प्रशासनिक संपर्कों के सहारे बहुत तेजी से संपत्ति और प्रभाव अर्जित किया। यह वर्ग केवल आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं हुआ, बल्कि धीरे-धीरे सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव का भी केंद्र बनता गया। नौकरशाहो और नेताओं की घोषित आकूत संपत्ति के सुरक्षित निवेश का ठिकाना है बिल्डर और जमीन के धंधे से जुड़े ऐसे लोग जिन्हें आवारा पूंजी चाहिए।

सोशल मीडिया के दौर ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है। अब छवि निर्माण केवल अखबारों या पोस्टरों तक सीमित नहीं है। डिजिटल मंचों पर समर्थकों और फॉलोवर्स के जरिए एक ऐसा आभामंडल तैयार किया जाता है जिसमें सफलता की एक नई परिभाषा गढ़ी जाती है।

ऐसे में फिर से वही पंक्तियां याद आती हैं-
“सखि, वसंत आया…”
और
“वनन में, बागन में, बगरो बसंत है।”

सवाल बस इतना है कि हमारे समय में खिलता यह “बसंत” आखिर किस तरह का है?

क्या यह वही वसंत है जो प्रकृति में जीवन का उत्सव लेकर आता है, या वह वसंत है जो शहरों की जमीनों, सामाजिक प्रभाव और शक्ति के समीकरणों के बीच अपनी पहचान बना रहा है?

धरसींवा से उठी यह बहस शायद इसी बड़े सवाल की याद दिलाती है कि बदलते भारत में जमीन, धर्म, राजनीति और प्रभाव के बीच खिंची रेखाएं आखिर कहां जाकर मिलती हैं। और जब ये रेखाएं मिलती हैं, तो वहां अक्सर एक नई कहानी जन्म लेती है एक ऐसी कहानी जिसमें हर शहर, हर कस्बे में कोई न कोई “बसंत” अपनी तरह से खिलता दिखाई देता है।

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