भारत–यूरोप के मध्य कारोबार को बूस्टर-डोज़?
-डॉ. सुधीर सक्सेना
लगभग दो दशक की कवायद के बाद भारत और यूरोपीय यूनियन (ईयू) के मध्य मुक्त व्यापार संधि (एफटीए) पर हस्ताक्षर हो गए। इस संधि के अमल में आने में यद्यपि थोड़ा समय लगेगा, लेकिन अमेरिका के टैरिफ युद्ध के मटमैले साये में यूरोपीय देशों के लिए भारत के विशाल बाज़ार के दरवाजे खुल गए हैं और कुछ ही बरसों में भारतीय बाज़ार यूरोपीय साजो-सामान से पट जाएंगे। इसके फलस्वरूप भारतीय उपभोक्ताओं को फ्रेंच वाइन समेत तरह-तरह की शराब और कारों के विकल्प सस्ती कीमतों पर उपलब्ध होंगे। भारतीय महिलाएँ इस बात पर इतराएँगी कि अब उन्हें यूरोपीय सौंदर्य प्रसाधन और परिधान बेहतर गुणवत्ता के साथ कम कीमतों पर मिल सकेंगे।
गौरतलब है कि भारत और यूरोपीय यूनियन के मध्य एफटीए के लिए वार्ता की शुरुआत डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्वकाल में वर्ष 2007 में हुई थी। वर्ष 1992 में मास्त्रिख्त संधि के बाद अगले ही वर्ष रोम में सात देशों की मौजूदगी में ईयू अस्तित्व में आया था। वर्ष 2009 में लिस्बन समझौते से इसे गति और विस्तार मिला। आज यूरोप-महाद्वीप के 27 देश इसके सदस्य हैं। बेल्जियम में इसका मुख्यालय है। इसका ध्येय-वाक्य है—‘अनेकता में एकता’। इसकी मुद्रा यूरो है, अपना राष्ट्रगान है और वैश्विक साख है। पाबंदियों और टैरिफ के अनिश्चित और नाज़ुक दौर में ईयू की महत्ता बढ़ गई है। इस बीच एक बड़ी घटना यह भी हुई कि यूके वर्ष 2020 में ईयू से बाहर हो गया, लिहाज़ा इस दूरगामी महत्व की संधि का लाभ उसे नहीं मिलेगा।
ईयू की अध्यक्ष उर्सुला फ़ॉन डेर लेयेन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हस्ताक्षरित एफटीए को भारत और यूरोप के मध्य कारोबार के लिहाज़ से ‘मील का पत्थर’ माना जा सकता है। डोनाल्ड ट्रंप के दंभ और धमकियों के दौर में इस संधि को यूरोपीय देशों की उद्योग-धंधों के लिए ‘बूस्टर डोज़’ कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने इंडिया एनर्जी वीक का आभासी उद्घाटन करते हुए कहा कि यह संधि ‘सभी सौदों की जननी’ है। उनका कहना था कि यह डील भारत में कपड़ा, रत्न, आभूषण, चमड़ा और जूट जैसे विभिन्न क्षेत्रों को फायदा पहुँचाएगी। उन्होंने कहा कि यह करार भारत की उत्पादन क्षमता को सुदृढ़ करेगा और सर्विस सेक्टर को नया संबल देगा।
इस महत्वपूर्ण संधि के तत्काल लागू न होने का कारण यह है कि पहले ईयू के सदस्य देशों की भाषाओं—जैसे फ्रेंच, जर्मन, इतालवी आदि—में इसका कानूनी दस्तावेज प्रकाशित होगा और फिर सभी धाराओं की सदस्य देशों में ‘लीगल स्क्रबिंग’ होगी। तत्पश्चात यूरोपीय परिषद की औपचारिक मंजूरी और यूरोपीय संसद की सहमति आवश्यक है। इसके बाद भारतीय संसद की पुष्टि के उपरांत यह संधि लागू होगी। इन प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद इसके इस वर्ष के भीतर अमल में आने की उम्मीद की जा सकती है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ पुष्परंजन मानते हैं कि इस बूस्टर डोज़ से ईयू के सदस्य देशों को बहुविध लाभ होगा। उनका मानना है कि भारत ने किसी भी व्यापारिक सहयोग को इतनी बड़ी ट्रेड ओपनिंग पहले कभी नहीं दी। उनकी बात की पुष्टि यूरोपीय कमीशन के आधिकारिक बयान से होती है। इससे यूरोपीय देशों के माल की भारतीय बाज़ारों में पहुँच और खपत आसान हो जाएगी। कमीशन ने एक चार्ट के ज़रिये वर्ष 2024 के आकलन के आधार पर बताया है कि मशीनरी और इलेक्ट्रिक उपकरणों पर उसे 16.3 बिलियन यूरो टैरिफ देने पड़े थे। अब इसके शून्य होने से बड़ा लाभ होगा। इसी तरह विमान और अंतरिक्ष यान निर्यात पर प्रदत्त 11 प्रतिशत के मान से 6.4 अरब यूरो की बचत होगी।
कल्पना कीजिए कि मशीनरी पर 44 प्रतिशत, रसायनों पर 22 प्रतिशत और फार्मास्यूटिकल्स पर 11 प्रतिशत टैरिफ यदि शून्य हो जाता है, तो यूरोपीय कंपनियों को कितना मुनाफा होगा। ऑप्टिकल, मेडिकल और सर्जिकल उपकरणों पर 27.5 प्रतिशत टैरिफ यदि हट जाए तो करीब तीन बिलियन यूरो बचेंगे। प्लास्टिक पर जीरो टैरिफ से दो बिलियन से अधिक की बचत होगी। यदि लोहे और इस्पात पर 22 प्रतिशत टैरिफ निरस्त होता है तो डेढ़ अरब यूरो से अधिक की बचत होगी। संधि से पहले पारस्परिक कारोबार से आठ लाख नौकरियों का समर्थन मिलता रहा है, अब इसमें भारी बढ़ोत्तरी होगी।
इस संधि से यूरोपीय किसानों की बाँछें खिलना स्वाभाविक है, क्योंकि एग्रो-फूड पर 36 प्रतिशत शुल्क में कमी से उन्हें बड़ा बाज़ार मिलेगा। संधि से मदिरा प्रेमी भी खुश होंगे, क्योंकि वाइन पर 150 प्रतिशत टैक्स घटकर 30 प्रतिशत पर आ जाएगा। बीयर पर टैक्स 110 प्रतिशत से 50 प्रतिशत होगा। लगभग 350 तरह के फलों, फलों के रस, चॉकलेट, ब्रेड, पेस्ट्री, सॉसेज और मांसाहारी व्यंजनों पर भी टैरिफ घटने से ये भारतीयों को सस्ते में मिलेंगे।
फिलहाल यूरोपीय संघ के देशों में इस संधि के नफे-नुकसान पर बहस जारी है। ईयू की अध्यक्ष उर्सुला का कहना है कि इस संधि से लाखों नौकरियाँ सृजित होंगी। यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा कहते हैं कि हम दो अरब लोगों के लिए बाज़ार बना रहे हैं।
अब यक्ष प्रश्न यह है कि क्या भारतीय कंपनियाँ और किसान आयातित चीज़ों की बाढ़ के बीच यूरोपीय मानकों और प्रतिस्पर्धा का सामना कर सकेंगे? देखना दिलचस्प होगा कि भारत के 140 करोड़ और यूरोप के 45 करोड़ लोगों के लिए एफटीए कितना बड़ा अवसर लेकर आता है? पुष्परंजन का यह सवाल वाजिब है कि यह भी देखना होगा कि इस संधि का भारत–अमेरिका और भारत–चीन संबंधों व व्यापार पर क्या असर पड़ता है?