न्याय की मिसाल: ‘मां’ ने हत्या की कोशिश करने वाली ‘बेटी’ को किया माफ, दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनाई अनोखी सजा

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया है जो कानूनी गलियारों में ‘न्याय और मानवता’ के बेजोड़ उदाहरण के रूप में चर्चा का विषय बना हुआ है। जस्टिस प्रतीक जालान की बेंच ने एक महिला के खिलाफ दर्ज ‘हत्या के प्रयास’ (IPC 307) जैसी गंभीर धारा वाले केस को न केवल खारिज कर दिया, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया कि कभी-कभी कानून की किताबी सख्ती से ऊपर पारिवारिक रिश्तों की पवित्रता और क्षमा का स्थान होता है।

अनाथ बच्ची से ‘बेटी’ बनने और फिर ‘आरोपी’ तक का सफर यह भावुक कर देने वाला मामला एंटोनेट पामेला फर्नांडिस और उनके लीगल गार्जियन (एक रिटायर्ड टीचर) से जुड़ा है। एंटोनेट जब मात्र तीन महीने की अनाथ बच्ची थीं, तब उन्हें इस रिटायर्ड टीचर और उनके दिवंगत पति ने गोद लिया था। दशकों तक उन्हें सगी बेटी की तरह पाला-पोसा और पढ़ाया गया। लेकिन फरवरी 2019 में एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, जब प्रार्थना के दौरान एंटोनेट ने अचानक अपने ही गार्जियन पर लकड़ी के क्रॉस और चाकू से हमला कर दिया। इस घटना ने वर्षों पुराने रिश्ते पर ‘अपराधी’ और ‘पीड़ित’ का ठप्पा लगा दिया था।

शेक्सपियर की पंक्तियों से महक उठा फैसला सुनवाई के दौरान जब शिकायतकर्ता (रिटायर्ड टीचर) ने अपनी भावनाओं को साझा किया, तो अदालत का माहौल बदल गया। उन्होंने कहा कि भले ही हमला हुआ, लेकिन उनका रिश्ता किसी बायोलॉजिकल मां-बेटी से कम नहीं है और उन्होंने अपनी बेटी को दिल से माफ कर दिया है।

जस्टिस जालान ने इस पर शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस’ की पंक्तियों “The quality of mercy is not strained” (दया का गुण दबाव में नहीं आता) का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि जहाँ पीड़ित पक्ष खुद माफी की इच्छा जता रहा हो, वहाँ ट्रायल जारी रखना न्याय का मजाक होगा। अदालत ने माना कि पारिवारिक झगड़े में माफी की भावना को सजा से ऊपर रखना ही सामाजिक हित में है।

सजा नहीं, सामाजिक सुधार का रास्ता हालांकि, कोर्ट ने आरोपी को पूरी तरह ‘फ्री’ नहीं छोड़ा। एक प्रतीकात्मक सजा और सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में कोर्ट ने एंटोनेट को अगले चार महीनों के भीतर सेंट स्टीफंस हॉस्पिटल में 30 कम्युनिटी सर्विस सेशन पूरे करने का आदेश दिया है। अदालत का मानना है कि इस सेवा से आरोपी के भीतर पश्चाताप और सुधार की भावना प्रबल होगी। यह फैसला साबित करता है कि न्याय का मकसद सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि रिश्तों को जोड़ना और समाज में सुधार लाना भी है।

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