CG RTE Admission Rules : छत्तीसगढ़ में RTE नियमों में बदलाव का विरोध : अब नर्सरी में नहीं सीधा पहली कक्षा से होगा प्रवेश; पैरेंट्स एसोसिएशन ने खोला मोर्चारायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के नियमों में किए गए हालिया संशोधन ने राज्य में एक नई बहस छेड़ दी है। विभाग के नए आदेश के अनुसार, आगामी शैक्षणिक सत्र 2026-27 से निजी स्कूलों में आरटीई के तहत गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चों का दाखिला केवल कक्षा पहली से ही होगा। सरकार के इस फैसले ने नर्सरी और प्री-प्राइमरी स्तर पर मिलने वाले प्रवेश के अधिकार को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
CG RTE Admission Rules : छत्तीसगढ़ में RTE नियमों में बदलाव का विरोध : अब नर्सरी में नहीं सीधा पहली कक्षा से होगा प्रवेश; पैरेंट्स एसोसिएशन ने खोला मोर्चा : RTE कानून के उल्लंघन का आरोप सरकार के इस फैसले की चौतरफा आलोचना शुरू हो गई है। छत्तीसगढ़ पैरेंट्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष किष्टोफर पॉल ने इस निर्णय को आरटीई कानून की धारा 12(1)(ग) का सीधा उल्लंघन बताया है। उन्होंने तर्क दिया कि कानून के प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई स्कूल पूर्व-प्राथमिक शिक्षा (Pre-School) संचालित करता है, तो उसे 25% आरक्षित सीटों पर दाखिला वहीं से शुरू करना होगा। उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए इस निर्णय को निरस्त करने की मांग की है।
विशेषज्ञों की चिंता: बढ़ेगी शैक्षणिक असमानता
शिक्षाविदों और विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव के दूरगामी नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं:
लर्निंग गैप (सीखने का अंतर): 3 से 6 वर्ष की आयु बच्चे के मानसिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है। निजी स्कूलों में प्री-प्राइमरी स्तर पर प्रवेश न मिलने से गरीब बच्चे शुरुआती बुनियादी शिक्षा से वंचित रह जाएंगे।
असमानता में वृद्धि: जब बच्चा सीधे कक्षा 1 में प्रवेश लेगा, तो वह उन बच्चों से शैक्षणिक रूप से पीछे रह सकता है जो नर्सरी से वहीं पढ़ रहे हैं। इससे बच्चों के भीतर हीन भावना पैदा हो सकती है।
ड्रॉपआउट का खतरा: आधार मजबूत न होने की स्थिति में बच्चों का पढ़ाई से मोहभंग होने और स्कूल छोड़ने की संभावना बढ़ जाएगी।
निजी स्कूल प्रबंधन भी विरोध में
हैरानी की बात यह है कि पैरेंट्स के साथ-साथ छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन ने भी इस फैसले को “आरटीई विरोधी” करार दिया है। एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता का कहना है कि यह गरीब बच्चों को शिक्षा के मुख्य पथ से पीछे धकेलने वाली कार्रवाई है। आलोचकों का मानना है कि सरकार प्री-प्राइमरी स्तर पर फीस प्रतिपूर्ति (Reimbursement) के वित्तीय बोझ से बचने के लिए यह रास्ता अपना रही है।
विभाग का तर्क और भविष्य की राह
शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस कदम से प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और गड़बड़ियों पर लगाम लगेगी। हालांकि, आरटीई विशेषज्ञ इसे समावेशी शिक्षा के मूल उद्देश्य के खिलाफ मान रहे हैं। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार चौतरफा विरोध और अदालती फैसलों के दबाव में अपने इस आदेश को वापस लेती है या यह मामला न्यायपालिका के दरवाजे तक पहुंचता है।