बिलासपुर रेल हादसा: साइकोलॉजिकल टेस्ट फेल होने के बावजूद मेमू ट्रेन पायलट को दी गई जिम्मेदारी

बिलासपुर, 07 नवंबर 2025: गेवरारोड–बिलासपुर मेमू हादसे के तीसरे दिन एक बड़ा खुलासा हुआ है। हादसे के समय ट्रेन चलाने वाले लोको पायलट विद्या सागर साइकोलॉजिकल (मनोवैज्ञानिक) टेस्ट में फेल पाए गए थे। हालांकि, इसके बावजूद उन्हें पैसेंजर ट्रेन चलाने की जिम्मेदारी दे दी गई, जिसके चलते लालखदान के पास हुए हादसे में विद्या सागर समेत 11 लोगों की मौत हो गई और 20 से अधिक यात्री घायल हुए।

हादसे का पीछे का सच

मेमू के लोको पायलटों को प्रमोशन के बाद पैसेंजर ट्रेन चलाने की जिम्मेदारी दी जाती है। इसके लिए केवल तकनीकी योग्यता ही नहीं, बल्कि साइकोलॉजिकल टेस्ट भी अनिवार्य होता है। इस टेस्ट में मानसिक स्थिति, विपरीत परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता और बौद्धिक कौशल की जांच की जाती है।

विद्या सागर को महीने भर पहले प्रमोट किया गया और मेमू ट्रेन की कमान सौंप दी गई। हादसे के तीसरे दिन यह जानकारी सामने आई कि उन्होंने एप्टीट्यूड टेस्ट पास नहीं किया था। एसईसीआर के मुख्य विद्युत इंजीनियर, परिचालन राजेंद्र कुमार साहू के 14 नवंबर 2024 के आदेश के अनुसार, एप्टीट्यूड टेस्ट पास नहीं करने वालों को मेमू ट्रेन चलाने की ट्रेनिंग नहीं दी जानी थी।

आदेश का उल्लंघन

आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि एप्टीट्यूड टेस्ट पास नहीं करने वाले लोको पायलटों को केवल सख्त परिस्थितियों में, और असिस्टेंट लोको पायलट की देखरेख में ही ट्रेन चलाने की जिम्मेदारी दी जा सकती है। इसके अलावा, ट्रेनिंग के लिए केवल उन्हीं ड्राइवरों को भेजने का निर्देश था जो टेस्ट में पास हुए हों।

हालांकि, विद्या सागर को प्रमोट करने और पैसेंजर ट्रेन चलाने की अनुमति देने से यह सुरक्षा प्रोटोकॉल पूरी तरह से नजरअंदाज हो गया।

हादसे के बाद सवाल

इस खुलासे ने एसईसीआर प्रबंधन की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि साइकोलॉजिकल टेस्ट में फेल पायलट को जिम्मेदारी देना गंभीर लापरवाही है और इसे रेल सुरक्षा मानकों के उल्लंघन के रूप में देखा जा सकता है।

इस घटना ने रेलवे विभाग में ट्रेनिंग और प्रमोशन प्रक्रिया की सख्ती और निगरानी की आवश्यकता को उजागर कर दिया है

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