इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की जाति जन्म से तय होती है और न तो धर्म परिवर्तन से उसमें बदलाव आता है, न ही विवाह के बाद। न्यायालय ने कहा कि किसी महिला का किसी दूसरी जाति में विवाह करने से उसकी मूल जाति समाप्त नहीं होती; वह जन्म से निर्धारित जाति के अंतर्गत ही मानी जाएगी।

मामला और अदालत की टिप्पणी
यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार दशम ने दिनेश और अन्य की आपराधिक अपील पर सुनाया। आरोपियों ने एससी-एसटी एक्ट के तहत उन्हें तलब किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में दावा किया था कि शिकायतकर्ता महिला ने जाट समुदाय के व्यक्ति से विवाह कर लिया है, इसलिए उसकी मूल जाति समाप्त हो गई।
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता, गवाहों और मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर सही तरीके से कार्रवाई की थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मामले में क्रॉस-केस होने से शिकायत खारिज नहीं होती।
जाति वही रहती है जो जन्म से निर्धारित होती है
अदालत ने कहा कि व्यक्ति चाहे धर्म परिवर्तन कर ले या विवाह कर ले, लेकिन उसकी जाति जन्म से निर्धारित ही रहती है। इस आधार पर आरोपियों की अपील खारिज कर दी गई और ट्रायल कोर्ट का सम्मन आदेश बरकरार रखा गया।
विवाद का विवरण
शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपियों ने उसके साथ मारपीट की, अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया और जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया। आरोपियों ने दलील दी कि महिला ने जाट समुदाय के व्यक्ति से विवाह कर लिया है, इसलिए एससी-एसटी एक्ट लागू नहीं होता। हाईकोर्ट ने यह दलील सिरे से खारिज कर दी और कहा कि कानून सभी के लिए समान रूप से लागू होता है।