नई दिल्ली। केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक परंपराओं से जुड़े वर्षों पुराने विवाद में उच्चतम न्यायालय अब निर्णायक सुनवाई करने जा रहा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने इस संवेदनशील मामले के लिए 9 जजों की विशेष संविधान पीठ का गठन किया है। यह पीठ 7 अप्रैल 2026 से उन पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करेगी, जिनमें महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश के अधिकार और परंपरागत मान्यताओं के बीच टकराव का मुद्दा शामिल है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्न एम. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची को शामिल किया गया है। न्यायालय ने इस पीठ के गठन में निष्पक्षता और व्यापक दृष्टिकोण सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न धर्मों के न्यायाधीशों के साथ एक महिला न्यायाधीश को भी स्थान दिया है।
यह पूरी कानूनी प्रक्रिया सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर वर्ष 2018 में आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से जुड़ी है। उस समय पांच जजों की पीठ ने बहुमत से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी को असंवैधानिक करार दिया था। अदालत ने इसे समानता के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता की मूल भावना के खिलाफ माना था। हालांकि, भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी मानने वाली आस्था से जुड़े इस फैसले के बाद देशभर में बहस छिड़ गई थी और कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं।
अब यह 9 जजों की संविधान पीठ न केवल सबरीमाला बल्कि अन्य धर्मों से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर भी विचार करेगी। इसमें मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित कुछ प्रथाओं और पारसी महिलाओं को अग्नि मंदिर में प्रवेश देने जैसे मुद्दे शामिल हैं। न्यायालय यह तय करेगा कि जब धार्मिक आस्था और मौलिक अधिकारों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो, तो किसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में इस सुनवाई को आधुनिक संविधान और सदियों पुरानी परंपराओं के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।