ऑस्ट्रेलिया से सुभाष मिश्र
भारत रंग महोत्सव के बहाने थिएटर से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं और सांस्कृतिक नीतियों की पड़ताल करना आज इसलिए ज़रूरी हो गया है क्योंकि रंगकर्म अब केवल मंच पर होने वाली कला नहीं रहा, बल्कि वह समाज, राज्य और सरकार की प्राथमिकताओं का आईना भी बन चुका है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय यानी एनएसडी द्वारा प्रतिवर्ष दिल्ली में आयोजित किया जाने वाला भारत रंग महोत्सव लंबे समय तक राजधानी-केंद्रित रहा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इसका विकेंद्रीकरण किया गया है। अब यह महोत्सव केवल मंडी हाउस या एनएसडी परिसर की गतिविधि नहीं रह गया, बल्कि देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों तक फैल चुका है।


भारत रंग महोत्सव 2026 अपने आकार और विस्तार के लिहाज़ से अब तक के सबसे बड़े संस्करणों में से एक है। इस वर्ष देशभर से आई हज़ारों प्रविष्टियों में से चयनित होकर लगभग ढाई सौ से अधिक भारतीय नाटकों को मंच दिया गया है, साथ ही एक दर्जन के आसपास अंतरराष्ट्रीय नाट्य प्रस्तुतियाँ भी इसमें शामिल हैं। ये नाटक भारत की दो सौ से अधिक भाषाओं और बोलियों में प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जिनमें लोकनाट्य, समकालीन रंगमंच, संस्कृत नाटक, प्रयोगधर्मी प्रस्तुतियाँ, जनजातीय और आदिवासी नाट्य रूप, बच्चों के नाटक, कठपुतली और नृत्य-नाट्य जैसी विविध विधाएँ शामिल हैं। यह महोत्सव दिल्ली के अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, असम, मणिपुर, मिज़ोरम, नागालैंड, सिक्किम, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कई केंद्रशासित प्रदेशों में एक साथ आयोजित किया जा रहा है। इस लिहाज़ से भारत रंग महोत्सव अब एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्र की तरह दिखाई देता है, जो केवल महानगरों तक सीमित नहीं, बल्कि दूरस्थ इलाकों तक भी पहुँचने का दावा करता है।


इसी क्रम में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 3 फरवरी से 8 फरवरी तक भारत रंग महोत्सव के अंतर्गत चयनित पाँच नाटकों और एक स्थानीय नाटक का मंचन दीनदयाल ऑडिटोरियम में जनसंपर्क विभाग के सहयोग से किया जा रहा है। यह अपने आप में एक सकारात्मक पहल है कि राष्ट्रीय स्तर पर चयनित नाटक यहाँ तक पहुँच रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या हमारे शहर और राज्य इस तरह की नाट्य गतिविधियों के लिए वास्तव में तैयार हैं। क्या हमने एक ऐसी रंग संस्कृति विकसित की है , जहां बड़ी मात्रा में रंग दर्शक तैयार हो सके ? भारत रंग महोत्सव का राज्यों में पहुँचना अच्छी बात है, लेकिन जिन जगहों पर यह पहुँच रहा है, वहाँ नाट्य गतिविधियों की बुनियादी संरचना, स्थायी मंच, प्रशिक्षण और दर्शक संस्कृति किस हालत में है—इसकी पड़ताल भी उतनी ही ज़रूरी है।
यदि हिंदी पट्टी के राज्यों की बात करें तो भोपाल आज भी नाट्य गतिविधियों के लिहाज़ से सबसे सक्रिय शहरों में गिना जाता है। इसकी एक बड़ी वजह वहाँ की संस्थाओं को मिलने वाला रिपर्टरी ग्रांट है, जिसमें नाटकों की नियमित प्रस्तुति अनिवार्य होती है। भारत भवन, रविंद्र भवन, जवाहर भवन और आदिवासी संग्रहालय जैसे स्थल भोपाल को एक जीवंत रंगशहर बनाते हैं। जबलपुर में विवेचना रंगमंडल और विवेचना समूह वर्षों से नाट्य समारोह और प्रस्तुतियाँ करते आ रहे हैं। उज्जैन में कालिदास समारोह होता है और सीधी, छिंदवाड़ा, बालाघाट तथा ग्वालियर जैसे शहरों में भी किसी न किसी रूप में नाट्य गतिविधियाँ चलती रहती हैं।


इसके उलट छत्तीसगढ़ में रंगमंच कुछ चुनिंदा शहरों तक ही सिमटा हुआ दिखाई देता है—रायपुर, भिलाई, बिलासपुर और जगदलपुर।और ये भी निजी प्रयासों से ज्यादा होते हैं । रायपुर में मुक्तिबोध नाट्य समारोह ही ऐसा आयोजन है जो नियमित रूप से याद आता है। खैरागढ़ स्थित इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में नाटक विषय मौजूद है, लेकिन वह भी स्थानीय राजनीति और संस्थागत सीमाओं से घिरा हुआ है। रायपुर में आज भी ढंग से नाटकों की प्रस्तुति के लिए 75 साल पुराना रंग मंदिर ही एकमात्र ऐसा स्थल है जिसे सही अर्थों में थिएटर कहा जा सकता है। बाकी ऑडिटोरियम बहुउद्देश्यीय हैं, जहाँ नाटक एक समझौते के साथ होता है।
इस स्थिति का सीधा असर रंगकर्मियों पर पड़ता है। नाटक में न तो स्थायी रोज़गार है और न ही आर्थिक सुरक्षा। दो-चार नाटकों के बाद बहुत से कलाकार छत्तीसगढ़ी सिनेमा की ओर रुख कर लेते हैं, क्योंकि वहीं उन्हें पहचान और आमदनी दोनों मिलती हैं। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो लौटकर फिर रंगमंच की ओर आते हैं। विडंबना यह है कि हम कालिदास के मेघदूत में वर्णित नाट्यशाला का उल्लेख बड़े गर्व से करते हैं और बताते हैं कि वह सरगुजा के आसपास थी, लेकिन आज नाटकों के लिए न तो सरकार के स्तर पर और न ही समाज के स्तर पर कोई स्थायी और सोच-समझकर बनाई गई व्यवस्था दिखाई देती है।
इन दिनों मैं ऑस्ट्रेलिया में हूँ और यहाँ से यह तुलना और भी साफ़ दिखाई देती है। सिडनी ओपेरा हाउस केवल एक भव्य इमारत नहीं है, बल्कि वह निरंतर चलने वाली सांस्कृतिक गतिविधियों का जीवंत केंद्र है। यहाँ ऑपेरा, थिएटर, संगीत, बैले और समकालीन प्रस्तुतियाँ पूरे वर्ष चलती रहती हैं। इसके साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया के छोटे-छोटे कस्बों और उपनगरों में भी कम्युनिटी थिएटर बने हुए हैं, जहाँ स्थानीय लोग नियमित रूप से नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रम देखते और करते हैं। खेलकूद के साथ-साथ थिएटर और कला गतिविधियों को बढ़ावा देना यहाँ की सांस्कृतिक नीति का हिस्सा है।



भारत में इसके ठीक उलट स्थिति दिखाई देती है। हमारे यहाँ सार्वजनिक या सामुदायिक भवन अक्सर किसी जाति या समुदाय विशेष के निजी समारोह या शादी ब्याह आदि के उपयोग तक सीमित रह जाते हैं। उनमें न मंचीय संरचना होती है, न प्रकाश-ध्वनि की सुविधा और न ही यह सोच कि वहाँ नियमित रूप से नाटकों की प्रस्तुति हो सकती है। प्रशिक्षण की स्थिति और भी चिंताजनक है। दिल्ली में एनएसडी और पुणे में एफटीआईआई जैसी संस्थाएँ तो हैं, लेकिन राज्यों में नाटक और फिल्मों के लिए व्यवस्थित प्रशिक्षण संस्थानों का लगभग अभाव है। छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी फिल्मों का बड़ा बाज़ार बन चुका है और सरकार फिल्म सिटी बनाने की बात भी कर रही है, लेकिन अभिनय, निर्देशन, लेखन और तकनीकी प्रशिक्षण के लिए कोई सशक्त संस्थान नहीं है।
दर्शक संस्कृति का सवाल भी उतना ही अहम है। मुंबई में पृथ्वी थिएटर या दिल्ली में एनएसडी के नाटक देखने लोग टिकट लेकर जाते हैं। छोटे शहरों में यह संस्कृति इसलिए विकसित नहीं हो पाती क्योंकि नाटक नियमित नहीं होते, कोई स्पष्ट कैलेंडर नहीं होता और थिएटर जीवन का हिस्सा नहीं बन पाता। इसमें राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और सांस्कृतिक संस्थाओं की बड़ी भूमिका होनी चाहिए।



भारत रंग महोत्सव का विकेंद्रीकरण एक स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन यह तभी सार्थक होगा जब इसके साथ-साथ राज्यों और शहरों में थिएटर का बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षण संस्थान, नियमित प्रस्तुति स्थल और दर्शक संस्कृति भी विकसित की जाए। अन्यथा यह महोत्सव कुछ दिनों का उत्सव बनकर रह जाएगा। रंगमंच को जीवित रखने के लिए उसे केवल कलाकारों का नहीं, बल्कि समाज और नीति , दोनों का साझा सरोकार बनाना होगा। ऑस्ट्रेलिया से यही सबसे बड़ी सीख मिलती है कि थिएटर एक सतत सांस्कृतिक प्रक्रिया है, आयोजन मात्र नहीं।