मानो पूरा शहर ही ऑक्सीजन ज़ोन हो

ऑस्ट्रेसिया से सुभाष मिश्र

हमारे देश में विकास के नाम पर जिस तरह से पेड़-पौधों की कटाई हो रही है, जिस तरह जंगल साफ किए जा रहे हैं और मानव बसाहट के लिए सीमेंट का एक पूरा जंगल खड़ा किया जा रहा है, ऐसे में शहरों में रहने वाले लोग ताज़ी हवा कैसे लें? वे मॉर्निंग वॉक या शाम की सैर के लिए कहाँ जाएँ, जहाँ सघन पेड़-पौधे हों?

इसी को देखते हुए कुछ जगहों पर ऑक्सीजन ज़ोन बनाए गए हैं, लेकिन वे भी बहुत सीमित हैं। किंतु यदि पूरा शहर ही ऑक्सीजन ज़ोन की तरह दिखाई दे जहाँ से भी आप गुज़रें, सघन पेड़-पौधे हों चाहे वह घर हो, सार्वजनिक स्थान हो या कोई भी संरचना हर जगह इतनी हरियाली हो कि आप भरपूर ऑक्सीजन ले सकें और यह महसूस करें कि कितनी विविधता के पेड़, पौधे, फूल और फल मौजूद हैं। ऐसा दृश्य आपको ऑस्ट्रेलिया में देखने को मिलता है।

मैं जब सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकला, तो अपने कमरे के आसपास पेड़-पौधे, घूमने के पाथवे के किनारे हरी घास यह सब देखकर मुझे लगा कि देखिए, यहाँ कितनी ऑक्सीजन है। हमारे यहाँ तालाबों के किनारे सौंदर्यीकरण के नाम पर दुकानें खोली जा रही हैं। यदि रायपुर के तेलीबांधा और कटोरा तालाब की बात करें, या भोपाल के बड़े तालाब की तो उनके किनारे-किनारे पहाड़ियों पर भी अब रेस्टोरेंट और व्यावसायिक संरचनाएँ खड़ी हो रही हैं।

छत्तीसगढ़, जो कभी अपने तालाबों के लिए जाना जाता था, आज वहाँ भी तालाबों के भीतर और आसपास बिल्डिंगें बनती जा रही हैं। तालाबों के शुद्धिकरण के नाम पर जो प्राकृतिक संरचना थी, उसे भी धीरे-धीरे नष्ट किया जा रहा है। पेड़-पौधों के साथ तो अत्यंत बेरहमी से व्यवहार किया जाता है।

यहाँ तक कि यदि कोई कैंपस या कॉलोनी है और वहाँ सार्वजनिक रूप से पेड़-पौधे या फूल लगे हैं, तो लोग उन्हें तोड़ने से भी नहीं हिचकते। लोग दूसरों के घरों में घुसकर फूल तोड़ लेते हैं, फल तोड़ लेते हैं। जबकि यहाँ (ऑस्ट्रेलिया में) ऐसा कोई कल्चर नहीं है। घरों में न तो बाउंड्री वॉल होती है, न ही कोई रोक-टोक, फिर भी कोई किसी के घर में घुसकर न फूल तोड़ता है, न फल। और जिनके पास फलदार पेड़ होते हैं, वे स्वयं फल तोड़कर बाहर रख देते हैं, ताकि लोग वहाँ से ले सकें। यही संस्कृति है।

यहाँ जो भी हरियाली दिखती है, वह किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि लोगों की जीवनशैली से आती है। घास की कटिंग करना, रविवार को पेड़-पौधे लगाना, उनकी देखभाल करना यह सब यहाँ के लोगों की दिनचर्या का हिस्सा है। वे विकास को इसी तरह देखते हैं।

अब सवाल यह है कि हम किस तरह का विकास चाहते हैं? क्या हम अपनी जान की कीमत पर, अपनी ऑक्सीजन की कीमत पर, थोड़े-से ऑक्सीजन ज़ोन बनाकर ही खुश रहना चाहते हैं? या फिर हम पूरे शहर को सिडनी की तरह ऑक्सीजन से भर देना चाहते हैं?

इस पर हमें खुद सोचने की ज़रूरत है।

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