बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से जुड़े वैवाहिक विवाद में हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए महासमुंद फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया है। पति द्वारा तलाक याचिका में पेश किए गए CCTV फुटेज को सबूत के तौर पर रिकॉर्ड में लेने का निर्देश देते हुए कोर्ट ने मामले की दोबारा सुनवाई के आदेश दिए हैं।
मामले की सुनवाई जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने की। कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धाराओं के तहत फैमिली कोर्ट को तकनीकी आधार पर इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य खारिज नहीं करने चाहिए।

बेडरूम में कैमरा लगाने को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग आरोप
पति का आरोप है कि उसकी पत्नी अन्य पुरुष के साथ आपत्तिजनक चैट और न्यूड वीडियो कॉल करती थी। इन गतिविधियों को प्रमाणित करने के लिए उसने बेडरूम में CCTV कैमरे लगाए और उनकी फुटेज सीडी के रूप में कोर्ट में पेश की।
वहीं पत्नी ने इन आरोपों को नकारते हुए कहा कि पति ने उसकी निजता में हस्तक्षेप करते हुए गुपचुप तरीके से कमरे में कैमरे लगवाए और लगातार निगरानी रखी। महिला ने पति पर दहेज की मांग और शारीरिक-मानसिक उत्पीड़न के भी आरोप लगाए हैं।

फैमिली कोर्ट का फैसला हाईकोर्ट ने किया निरस्त
महासमुंद फैमिली कोर्ट ने पहले पति की तलाक याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि प्रस्तुत CCTV फुटेज के साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B का प्रमाणपत्र संलग्न नहीं था। साथ ही पत्नी की दांपत्य अधिकारों की बहाली की याचिका स्वीकार कर ली गई थी।
हाईकोर्ट ने इस आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट को विवाद के प्रभावी निपटारे के लिए सभी प्रासंगिक दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पर विचार करना चाहिए, भले ही वे तकनीकी रूप से एविडेंस एक्ट की सभी शर्तों को पूरा न करते हों।
चार साल से लंबित मामला, प्राथमिकता से निपटाने के निर्देश
कोर्ट ने यह भी कहा कि मामला चार वर्ष से अधिक समय से लंबित है, इसलिए फैमिली कोर्ट इसे प्राथमिकता के आधार पर सुनते हुए शीघ्र निर्णय करे।
अब महासमुंद फैमिली कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलों और CCTV फुटेज को रिकॉर्ड पर लेकर मामले की नए सिरे से सुनवाई होगी।