अभनपुर मॉब लिंचिंग मामला: हाईकोर्ट ने डीजीपी से मांगी दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच रिपोर्ट, 28 अप्रैल को होगी अगली सुनवाई

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जादू-टोना के संदेह में पिता और बेटों की बेरहमी से पिटाई कर उन्हें अर्धनग्न अवस्था में गांव में घुमाने और रात भर बंधक बनाने की घटना को बेहद गंभीरता से लिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र अग्रवाल की खंडपीठ ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया है कि वे दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ की गई विभागीय जांच की प्रगति रिपोर्ट शपथपत्र के माध्यम से प्रस्तुत करें। मामले की अगली सुनवाई के लिए 28 अप्रैल की तिथि निर्धारित की गई है।

यह मामला अभनपुर थाना क्षेत्र का है, जहां 13 मार्च 2025 को ग्रामीणों ने काला जादू के संदेह में तिलक साहू, उनके पिता अमर सिंह साहू और भाई नरेश साहू की सामूहिक पिटाई की थी। आरोप है कि पीड़ितों को अर्धनग्न कर पूरे गांव में घुमाया गया, उनके चेहरे पर कालिख पोती गई और जूतों की माला पहनाकर रात भर चौक पर बंधक बनाकर रखा गया। सूचना मिलने पर पहुंची डायल 112 की टीम ने पीड़ितों की शिकायत दर्ज करने के बजाय उनसे एक सादे कागज पर हस्ताक्षर कराए कि वे कोई कार्रवाई नहीं चाहते और उन्हें गांव के बाहर छोड़ दिया।

पुलिस द्वारा प्राथमिकी दर्ज न किए जाने पर पीड़ितों ने न्यायिक मजिस्ट्रेट की शरण ली। न्यायालय के आदेश के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ टोनही प्रताड़ना अधिनियम और अन्य धाराओं के तहत मामला तो दर्ज किया, लेकिन अधिकांश धाराएं जमानती लगा दीं। पुलिस की इस कार्यप्रणाली के खिलाफ पीड़ितों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने मॉब लिंचिंग जैसी गंभीर घटना को रोकने में विफलता और निष्पक्ष जांच न होने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए पूर्व में डीजीपी, आईजी और एसपी रायपुर को नोटिस जारी किया था।

मामले की पिछली सुनवाई के दौरान डीजीपी ने स्वीकार किया कि तत्कालीन थाना प्रभारी सिद्धेश्वर प्रताप सिंह और उप-निरीक्षक नरसिंह साहू की ओर से कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही हुई है। इन अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर उन्हें चार्जशीट थमा दी गई है। हाईकोर्ट ने अपने ताजा आदेश में कहा है कि याचिकाकर्ता अपनी शिकायतों को विचारण न्यायालय के समक्ष रख सकते हैं, जो साक्ष्यों के आधार पर उचित धाराओं के तहत कार्यवाही सुनिश्चित करेगा। हालांकि, दोषी पुलिस अधिकारियों के आचरण और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के उद्देश्य से हाईकोर्ट ने इस प्रकरण को अपने पास लंबित रखा है और जांच के अंतिम परिणाम की जानकारी मांगी है।

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