जानें क्या है इसके पीछे की मान्यता
राजेश राज गुप्ता
सोनहत, कोरिया। जहाँ एक ओर पूरा देश 3 मार्च को होली मनाने की तैयारियों में जुटा है, वहीं छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले से एक दिलचस्प खबर सामने आई है। सोनहत विकासखंड के ग्राम पंचायत बसवाही में ग्रामीणों ने एक हफ्ते पहले ही हर्षोल्लास के साथ होली का त्योहार मना लिया है। गांव की गलियों में मांदर की थाप और फाग गीतों के बीच जमकर रंग-गुलाल उड़ा।
पूर्वजों की परंपरा बसवाही गांव के युवाओं और बुजुर्गों का कहना है कि यह कोई नया बदलाव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा है। यहाँ कैलेंडर की तय तिथि से ठीक एक सप्ताह पूर्व ‘सम्मत’ होलिका दहन जलाया जाता है और उसके अगले दिन पूरे गांव में होली खेली जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, वे अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित इस परंपरा का पालन पूरी निष्ठा से करते आ रहे हैं।
अनहोनी और देव-प्रकोप इस अनोखी परंपरा के पीछे गहरी धार्मिक आस्था और भय दोनों जुड़े हैं। स्थानीय ग्रामीणों का मानना है कि यदि तय समय (एक हफ्ते पहले) पर होली नहीं मनाई गई, तो गांव के देवी-देवता नाराज हो सकते हैं। ग्रामीणों ने बताया कि पूर्वजों की मान्यता है कि ऐसा न करने पर गांव में कोई बड़ी विपदा या प्राकृतिक आपदा आने का डर रहता है। गांव की सुख-शांति और खुशहाली बनाए रखने के लिए ही इस परंपरा को जीवित रखा गया है।
होली के इस विशेष आयोजन में पूरा गांव एक रंग में रंगा नजर आया। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी फाग गीतों की धुन पर नाचते-गाते दिखे। पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘मांदर’ की गूंज ने उत्सव के उत्साह को दोगुना कर दिया। ग्रामीणों ने एक-दूसरे को गुलाल लगाकर बधाई दी और पकवानों का आनंद लिया।