कमजोर पुष्पन और कमजोर फलन की प्रबल आशंका
राजकुमार मल
भाटापारा- नई पत्तियों की संख्या कम हो सकती है। फलन कमजोर होने की आशंका बन रही है। तेंदू के वृक्षों में यह नया बदलाव इसलिए क्योंकि तापमान सामान्य से ज्यादा है। इसका असर साल और महुआ के वृक्षों में भी पड़ना तय माना जा रहा है।
वन आधारित आजीविका इस वर्ष बेहद कठिन होने की आशंका है क्योंकि वर्षा का अनियमित वितरण और तापमान में असाधारण वृद्धि दर्ज की गई है। चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि बीते दो सालों से सूखे दिनों की अवधि लगातार बढ़ रही है। प्रभाव कमजोर पुष्पन, कमजोर फलन और कमजोर पुनर्जनन के रूप में देखा जाएगा।
फैनोलॉजी में स्पष्ट बदलाव
तापमान में वृद्धि, वर्षा का अनियमित वितरण, मिट्टी में मानक नमी की कमी और सूखे की अवधि में वृद्धि। यह चार बदलाव कई प्रजातियों में तीन से चार दिन पहले ही पुष्पन की स्थितियां ला रहें हैं। यह परिवर्तन परागण की प्रक्रिया को बाधित करने लगे हैं। फलस्वरुप फल उत्पादन और बीज उत्पादन कमजोर होने की प्रबल आशंका बन रही है। इसका प्रभाव वन पारिस्थितिकी कृषि और वन आधारित आजीविका पर भी देखा जाएगा।
इन वृक्षों में गहरा प्रभाव
अनियमित वर्षा और सामान्य से ज्यादा तापमान का पहला प्रतिकूल असर तेंदू के वृक्षों में देखा जाएगा। नई पत्तियां निकलेंगी लेकिन मानक गुणवत्ता कमजोर रह सकती है। फल उत्पादन में 20 से 25% की गिरावट की धारणा है। पुष्पन का समय है महुआ में लेकिन लग रहे फूल बेहद कमजोर हैं। कुछ क्षेत्र में तो पुष्पन के संकेत नहीं मिल रहे हैं। याने तापमान में वृद्धि के दौरान जब पुष्प आएंगे तो न केवल जल्दी गिरेंगे बल्कि गुणवत्ता भी बेहद कमजोर होने की आशंका है। साल के वृक्ष इस बरस कम पुष्पन के दौर से गुजर सकते हैं। फलस्वरुप फलन कमजोर होगा और बीज उत्पादन में गिरावट आ सकती है।
वन्य जीवों पर प्रभाव
पुष्पन और फलन का समय चक्र बदलने से केवल कृषि और वन आधारित आजीविका पर ही असर नहीं पड़ेगा बल्कि वन्यजीवों के खाद्य आपूर्ति लाइन पर भी प्रभाव पड़ेगा। भालू, बंदर और चमगादड़ों के पसंदीदा आहार महुआ फूल के लिए दूर तक दौड़ लगानी पड़ेगी, तो हिरण और जंगली सुअरों को साल बीज की कमी के बीच दूसरे आहार की खोज करनी होगी। गिलहरी सहित अन्य पक्षियों को भी चिरौंजी की तलाश में दूसरे वन क्षेत्र की तलाश करनी होगी।
बदल रहा है जंगलों का प्राकृतिक चक्र
बढ़ता तापमान और वर्षा का असंतुलित वितरण जंगलों के प्राकृतिक जीवन चक्र को प्रभावित कर रहा है। इसका सबसे स्पष्ट प्रभाव वृक्षों में पुष्पन एवं फलन में बदलाव के रूप में दिखाई दे रहा है, जहाँ कई वृक्ष प्रजातियों में पुष्पन और पत्तियों के निकलने का समय बदल रहा है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है तो तेंदू, महुआ और साल जैसे आर्थिक एवं पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वपूर्ण वृक्षों के फलन और बीज उत्पादन पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। इससे न केवल वन पारिस्थितिकी प्रभावित होगी बल्कि वन आधारित आजीविका और वन्यजीवों की खाद्य श्रृंखला पर भी दबाव बढ़ेगा।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर