बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए बिलासपुर के सिरगिट्टी थाने में दर्ज मारपीट और लूट की एफआईआर को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने इस मामले में आदेश जारी करते हुए कहा कि आरोपों में अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं और कानूनी प्रक्रिया को जारी रखना न्याय का दुरुपयोग होगा।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता सुमन यादव, इंदु चंद्रा, नंद राठौर, मोहम्मद इस्लाम और राहुल जायसवाल के खिलाफ 7 सितंबर 2024 को अपराध पंजीबद्ध किया गया था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि 6 सितंबर की रात तिफरा स्थित ग्रामीण बैंक के पास आरोपियों ने गाली-गलौज और मारपीट करते हुए सोने की चेन छीन ली थी। इस पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि एफआईआर दर्ज करने में करीब 13 घंटे की देरी की गई है, जिससे पूरी घटना संदिग्ध प्रतीत होती है। दलील में यह भी बताया गया कि घटना से पहले स्वयं याचिकाकर्ताओं ने 112 नंबर और अभिव्यक्ति ऐप के माध्यम से पुलिस को सूचना दी थी। उन्होंने सीसीटीवी फुटेज का हवाला देते हुए इसे बदले की भावना से दर्ज कराई गई जवाबी कार्रवाई करार दिया। दूसरी ओर, शासन की ओर से तर्क दिया गया कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और चालान भी पेश किया जा चुका है, इसलिए एफआईआर रद्द करने का कोई आधार नहीं है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री अभियोजन की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा करती है। अदालत ने माना कि यदि एफआईआर के आरोपों को मान भी लिया जाए, तब भी अपराध सिद्ध होने की संभावना नहीं है। याचिका स्वीकार करते हुए न्यायालय ने पांचों याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध दर्ज अपराध क्रमांक 624/2024 को पूरी तरह से रद्द कर दिया है।